मिल रहे हो बड़ी अक़ीदत से

ख़ौफ़ आता है इतनी इज़्ज़त से

हम ज़ियादा बिगाड़ देते हैं
बच के रहना हमारी सोहबत से

लोग किरदार बनना चाहते हैं
जैसे मुमकिन है सब रियाज़त से

उस के दिल में उतरने लगता हूँ
जो मुझे देखता है नफ़रत से

ज़हर ईजाद हो गया इक दिन
लोग मरते थे पहले ग़ैरत से

पर्दा-दारों ने ख़ुद-कुशी कर ली
सहन झाँका गया किसी छत से

फ़ासले बढ़ गए रिफ़ाक़त में
दूरियाँ पड़ गई हैं क़ुर्बत से

उस ने मुझ को भुला दिया इक दिन
और भुलाया भी किस सुहूलत से

अपनी गर्दन झुका के बात करो
तुम निकाले गए हो जन्नत से

— Nadeem Bhabha

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