दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे
    उस ने भेजा है इक गुलाब मुझे
    Iftikhar Raghib
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    क्या है क़िस्मत में क़ल्ब-ए-माइल की
    हद नहीं रंज के वसाइल की

    दस्त-बरदार है मसीहाई
    देख हालत अब अपने घाइल की

    वो कि हर मसअले का मेरे हल
    मैं कि जड़ उस के सब मसाइल की

    कितना फैला है ज़हर वहशत का
    कितनी तासीर हम ने ज़ाइल की

    कासा-ए-इश्क़ में वफ़ा की भीक
    और क्या आरज़ू थी साइल की

    उन की ज़िद का था सामना 'राग़िब'
    धज्जियाँ उड़ गईं दलाइल की
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    Iftikhar Raghib
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    उस ने कहा था एक शब तुम ने मुझे बदल दिया
    कैसे कहूँ मैं उस से अब तुम ने मुझे बदल दिया

    जादू असर हर इक अदा चेहरा है या कि मो'जिज़ा
    दिखला के इक हसीन छब तुम ने मुझे बदल दिया

    देखो मिरी शरारतें शोख़ी भरी इबारतें
    चंचल था इस क़दर मैं कब तुम ने मुझे बदल दिया

    सरगोशियों का मैं हदफ़ हैरानियाँ हैं हर तरफ़
    शश्दर है आइना अजब तुम ने मुझे बदल दिया

    दिल में है यूँ उमंग क्यों निखरा हुआ है रंग क्यों
    अब पूछते हो क्या सबब तुम ने मुझे बदल दिया

    इक हर्फ़-ए-इंतिज़ार हूँ हर आन बे-क़रार हूँ
    'राग़िब' नहीं रहा मैं अब तुम ने मुझे बदल दिया
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    Iftikhar Raghib
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    हैफ़ बाइ'स तिरे इताब का मैं
    क्या करूँ अपने इज़्तिराब का मैं

    तेरी आँखों के आइने में रहूँ
    अक्स बन जाऊँ तेरे ख़्वाब का मैं

    रब्त में भी हिसाब उन का मैं
    और क़ाइल हूँ बे-हिसाब का मैं

    और कब तक रहूँ मैं मिस्ल-ए-सवाल
    मुंतज़िर आप के जवाब का मैं

    सर्द-मेहरी का है लिहाफ़ उन पर
    और पैकर हूँ इज़्तिराब का मैं

    जो मोहब्बत के नाम है मंसूब
    इक वरक़ हूँ उसी किताब का मैं

    मुजतनिब मेरे इल्तिफ़ात से वो
    तख़्ता-ए-मश्क़ इज्तिनाब का मैं

    क्या करूँ आइना है मेरे पास
    वर्ना दुश्मन नहीं जनाब का मैं

    क्यों अँधेरे ख़िलाफ़ हैं मेरे
    कौन लगता हूँ आफ़्ताब का मैं

    मत्न रूदाद-ए-इश्क़ का 'राग़िब'
    या ख़ुलासा जुनूँ के बाब का मैं
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    Iftikhar Raghib
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    क्यों है लहजा बुझा बुझा तेरा
    क्या हुआ अब वो वलवला तेरा

    वक़्फ़े वक़्फ़े से खोल कर खिड़की
    अच्छा लगता है झाँकना तेरा

    तेरी आँखों में झाँक कर देखूँ
    अक्स मेरा हो आइना तेरा

    क्या मनाएगा अपने दिल की ख़ैर
    जिस से पड़ जाए वास्ता तेरा

    तीर सा लग रहा है ग़ैरों को
    मेरे शे'रों पे तब्सिरा तेरा

    टूट जाए न डोर साँसों की
    बाँध रक्खा है आसरा तेरा

    जो भी मिलता था मरने वाला था
    किस से करता मैं तज़्किरा तेरा

    झाँक कर तेरी झुकती आँखों में
    पढ़ लिया मैं ने फ़ैसला तेरा

    कौन समझेगा मेरे दिल का हाल
    किस ने देखा है देखना तेरा

    जाने कब पिघले उन का दिल 'राग़िब'
    जाने कब हल हो मसअला तेरा
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    Iftikhar Raghib
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    एक रिश्ता दर्द का है मेरे उस के दरमियाँ
    फिर भी कितना फ़ासला है मेरे उस के दरमियाँ

    मेरे उस के दरमियाँ यूँ ही रहेंगी रंजिशें
    कोई जब तक तीसरा है मेरे उस के दरमियाँ

    बात हम दोनों की है हम ख़ुद निमट लेंगे कभी
    क्यों ज़माना बोलता है मेरे उस के दरमियाँ

    कल तलक थे साथ हम इक दूसरे के और आज
    मुद्दतों का फ़ासला है मेरे उस के दरमियाँ

    छोटी-मोटी रंजिशें हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिट जाएँगी
    और अभी बिगड़ा ही क्या है मेरे उस के दरमियाँ

    उस को भी हो जाएगी मुझ से मोहब्बत पर अभी
    गुफ़्तुगू का सिलसिला है मेरे उस के दरमियाँ

    आरज़ू दिल की है 'राग़िब' उम्र भर रौशन रहे
    जो यक़ीं का इक दिया है मेरे उस के दरमियाँ
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    फिर उठाया जाऊँगा मिट्टी में मिल जाने के बाद
    गरचे हूँ सहमा हुआ बुनियाद हिल जाने के बाद

    आप अब हम से हमारी ख़ैरियत मत पूछिए
    आदमी ख़ुद का कहाँ रहता है दिल जाने के बाद

    सख़्त-जानी की बदौलत अब भी हम हैं ताज़ा-दम
    ख़ुश्क हो जाते हैं वर्ना पेड़ हिल जाने के बाद

    ख़ौफ़ आता है बुलंदी की तरफ़ चढ़ते हुए
    गुल का मुरझाना ही रह जाता है खिल जाने के बाद

    फ़िक्र लाहक़ है हमेशा मिस्ल-ए-तुख़्म-ए-ना-तवाँ
    हश्र क्या होगा दरून-ए-आब-ओ-गिल जाने के बाद

    इस तरह हैरान हैं सब देख कर 'राग़िब' मुझे
    जैसे कोई आ गया हो मुस्तक़िल जाने के बाद
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    दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे
    उस ने भेजा है इक गुलाब मुझे

    गुफ़्तुगू सुन रहा हूँ आँखों की
    चाहिए आप का जवाब मुझे

    वक़्त-ए-फ़ुर्सत का इंतिज़ार करूँ
    इतनी फ़ुर्सत कहाँ जनाब मुझे

    ज़ोम था बे-हिसाब चाहत है
    उस ने समझा दिया हिसाब मुझे

    पढ़ता रहता हूँ आप का चेहरा
    अच्छी लगती है ये किताब मुझे

    लीजिए और इम्तिहान मिरा
    और होना है कामयाब मुझे

    कोई ऐसी ख़ता करूँ 'राग़िब'
    जिस का मिलता रहे सवाब मुझे
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    Iftikhar Raghib
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    छोड़ा न मुझे दिल ने मिरी जान कहीं का
    दिल है कि नहीं मानता नादान कहीं का

    जाएँ तो कहाँ जाएँ इसी सोच में गुम हैं
    ख़्वाहिश है कहीं की तो है अरमान कहीं का

    हम हिज्र के मारों को कहीं चैन कहाँ है
    मौसम नहीं जचता हमें इक आन कहीं का

    इस शोख़ी-ए-गुफ़्तार पर आता है बहुत प्यार
    जब प्यार से कहते हैं वो शैतान कहीं का

    ये वस्ल की रुत है कि जुदाई का है मौसम
    ये गुलशन-ए-दिल है कि बयाबान कहीं का

    कर दे न इसे ग़र्क़ कोई नद्दी कहीं की
    ख़ुद को जो समझ बैठा है भगवान कहीं का

    इक हर्फ़ भी तहरीफ़-ज़दा हो तो दिखाए
    ले आए उठा कर कोई क़ुरआन कहीं का

    महबूब नगर हो कि ग़ज़ल गानो हो 'राग़िब'
    दस्तूर-ए-मोहब्बत नहीं आसान कहीं का
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    Iftikhar Raghib
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    इंकार ही कर दीजिए इक़रार नहीं तो
    उलझन ही में मर जाएगा बीमार नहीं तो

    लगता है कि पिंजरे में हूँ दुनिया में नहीं हूँ
    दो रोज़ से देखा कोई अख़बार नहीं तो

    दुनिया हमें नाबूद ही कर डालेगी इक दिन
    हम होंगे अगर अब भी ख़बर-दार नहीं तो

    कुछ तो रहे अस्लाफ़ की तहज़ीब की ख़ुश्बू
    टोपी ही लगा लीजिए दस्तार नहीं तो

    हम बरसर-ए-पैकार सितमगर से हमेशा
    रखते हैं क़लम हाथ में तलवार नहीं तो

    भाई को है भाई पे भरोसा तो भला है
    आँगन में भी उठ जाएगी दीवार नहीं तो

    बे-सूद हर इक क़ौल हर इक शेर है 'राग़िब'
    गर उस के मुआफ़िक़ तिरा किरदार नहीं तो
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    Iftikhar Raghib
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