क्या है क़िस्मत में क़ल्ब-ए-माइल की
हद नहीं रंज के वसाइल की
दस्त-बरदार है मसीहाई
देख हालत अब अपने घाइल की
वो कि हर मसअले का मेरे हल
मैं कि जड़ उस के सब मसाइल की
कितना फैला है ज़हर वहशत का
कितनी तासीर हम ने ज़ाइल की
कासा-ए-इश्क़ में वफ़ा की भीक
और क्या आरज़ू थी साइल की
उन की ज़िद का था सामना 'राग़िब'
धज्जियाँ उड़ गईं दलाइल की
— Iftikhar Raghib















