चश्म-ए-दिल जिस की राह तकती है
अब वो बिजली कहाँ चमकती है
देर लगती है जिस को जलने में
आग वो देर तक दहकती है
तुझ से मिलने की आस की चिड़िया सहन-ए-दिल में बहुत चहकती है
दिल दहलता है दूसरी का भी
एक दीवार जब दरकती है
छुपने वाली नहीं मिरी चाहत
तेरी आँखों में जो चमकती है
तिश्नगी मेरी जिस से है मंसूब
वो सुराही कहाँ छलकती है
जाने कब वो करें वफ़ा दिल से
रोज़ चश्म-ए-वफ़ा फड़कती है
जलने वालों से कोई क्या पूछे
क्यूँ उन्हें रौशनी खटकती है
आस टूटी तो साथ ही 'राग़िब'
साँस की डोर टूट सकती है
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