Kashif Adeeb Makanpuri

Kashif Adeeb Makanpuri

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Kashif Adeeb Makanpuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kashif Adeeb Makanpuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मिरी आरज़ू का हासिल तिरे लब की मुस्कुराहट हैं क़ुबूल मुझ को सब ग़म तिरी इक ख़ुशी के बदले — Kashif Adeeb Makanpuri
तुम भी मुझ को ऐसा वैसा समझे क्या होश में आओ अपने जैसा समझे क्या — Kashif Adeeb Makanpuri

Ghazal

मेरे ग़मख़्वार वक़्त लगता है प्यार है प्यार वक़्त लगता है प्यार में सब्र भी ज़ुरुरी है होगा इज़हार वक़्त लगता है दिल में ऐसे जगह नहीं मिलती मेरे सरकार वक़्त लगता है रंग अपना दिखाएंगे इक दिन गुल हों या ख़ार वक़्त लगता है उन की ज़ुल्फ़ों कि जाल में मुजरिम हो गिरफ़्तार वक़्त लगता है तेरे पीछे चलेगा ख़ुश हो कर सारा संसार वक़्त लगता है पारसा ऐसे कैसे हो जाए इक गुनहगार वक़्त लगता है मुझ सेे मिलने को मेरे ख़्वाबों में तुझ को हर बार वक़्त लगता है लोग जिस की मिसाल देते रहें हो वो किरदार वक़्त लगता है क्या हुआ क्यूँँ उलझ गए काशिफ़ होंगे अश'आर वक़्त लगता है — Kashif Adeeb Makanpuri
फ़ासला जब दरमियाँ में अपने अपने रह गया हाए फिर मेरा मुक़द्दर बनते बनते रह गया डूबने लगता है सूरज की तरह हर आदमी ख़ुद नुमाई का ये जज़्बा जैसे तैसे रह गया उम्र भर मुझ को परीशाँ अब करेगा ये सवाल कुछ तो था जो उस के लब पर आते आते रह गया उस सेे मिलना था यक़ीनन बन्दिशों को तोड़कर ऐन मुमकिन था ये होना होते होते रह गया वक़्त की रफ़्तार ने बदली है करवट इस तरह आगे आगे जो चला था पीछे पीछे रह गया मिलती जुलती ही कहानी थी मेरी उस शख़्स से वो मुझे और मैं उसे फिर सुनते सुनते रह गया मिल गई मंज़िल किसी को अपनी काशिफ़ देखिए और कोई मंज़िल की जानिब बढ़ते बढ़ते रह गया — Kashif Adeeb Makanpuri
तितली कँवल गुलाब की रंगत में पड़ गए जब से हुज़ूर आप की सोहबत में पड़ गए तुम को तो होशियार समझते थे हम मगर तुम को ये क्या हुआ कि मोहब्बत में पड़ गए हम इस लिए भी और तरक़्क़ी न कर सके भोले से चेहरे देखे मुरव्वत में पड़ गए ख़ुद हम ने अपना साथ बहुत दूर तक दिया आख़िर में हम भी अपनी ज़ुरुरत में पड़ गए तुम ने ज़रा सी बात को जब तूल कर दिया जितने भी अक़्लमन्द थे हैरत में पड़ गए जंगल में कोई आदमी आया ज़ुरूर है क्यूँँ जानवर भी बुग़्ज़ो अदावत में पड़ गए उस दिन से अपने वारे न्यारे ही हो गए जिस दिन से तेरे कूचऐ उल्फ़त में पड़ गए इज़हारे इश्क़ जब से किया है ज़बान से काशिफ़ अदीब तुम भी क़यामत में पड़ गए — Kashif Adeeb Makanpuri
देखिए मायूस चेहरे पर हँसी की हाज़िरी दिल में जब हो जाए धोके से ख़ुशी की हाज़िरी अब ख़ुदा जाने कि हो अन्जाम क्या नादान का शाख़ पर है फूल की सूरत कली की हाज़िरी कैसे लफ़्ज़ों में बयाँ हो पाए ये मन्ज़र हसीं आस्मा पर चाँद घर में चाँदनी की हाज़िरी एक तो आँखें मुशर्रफ़ होंगी उन की दीद से और हो जाएगी ऐसे हाज़िरी की हाज़िरी करते हैं दो प्यार करने वाले जब आपस में बात अच्छी लगती है कहाँ उस दम किसी की हाज़िरी उस गली में कोई मुझ को जानने वाला नहीं मुद्दतों मैं ने लगाई जिस गली की हाज़िरी बा अदब हो कर खड़े हैं हाज़िरे दरबार सब ज़िंदगानी ले रही है अब सभी की हाज़िरी उस हसीं चेहरे का ही फ़ैज़ान है काशिफ़ अदीब ज़ेहन में होने लगी है शा'इरी की हाज़िरी — Kashif Adeeb Makanpuri
बनने वाली ही थी नफ़रत की कहानी दुनिया दौड़ कर अहले मोहब्बत ने बचा ली दुनिया इस में बस आप ही बस आप नज़र आते हैं मैं ने दुनिया से अलग अपनी बनाई दुनिया आपने अपना बताया है मुझे जिस दिन से दे रही है मुझे आ आके बधाई दुनिया यूँँ ही करते नहीं सब लोग मोहब्बत मुझ से प्यार का धन है लुटाया तो कमाई दुनिया ये है गिरगिट की तरह रंग बदलती अपना लाल पीली कभी नीली कभी धानी दुनिया नफ़रतों का है हर इक सम्त अँधेरा फिर भी प्यार से देखो नज़र आएगी प्यारी दुनिया कभी तन्हाई में हँसता हूँ कभी रोता हूँ तेरी यादों की हसीं एक बना ली दुनिया तू मुझे भूल न पायेगी क़यामत तक भी दे के जाऊँगा तुझे ऐसी निशानी दुनिया माँ के क़दमों को जो चूमा तो लगा ये काशिफ़ माँ के क़दमों में सिमट आई है सारी दुनिया — Kashif Adeeb Makanpuri
तुम भी मुझ को ऐसा वैसा समझे क्या होश में आओ अपने जैसा समझे क्या उन के लबों पर मेरा चर्चा समझे क्या कैसे बही ये उल्टी गंगा समझे क्या लाख उसे दुनियादारी समझाई मगर दीवाना तो फिर दीवाना समझे क्या हस्ती को हंस हंस के मिटाना पड़ता है दिल का लगाना खेल तमाशा समझे क्या आँखों ही आँखों में तुम को ऐ हमदम अब तक मैं ने जो समझाया समझे क्या वो मासूम तो एक खिलौना समझेगा अंगारा या फूल है बच्चा समझे क्या पाप दिलों में खोट है सबकी आँखों में तेरा मेरा रिश्ता दुनिया समझे क्या आपने ही जब ग़ैर बना डाला मुझ को कोई मुझे दुनिया में अपना समझे क्या मैं इक चाँद हूँ अपने गगन का ऐ काशिफ़ आप मुझे टूटा हुआ तारा समझे क्या — Kashif Adeeb Makanpuri
परिंदे जिस तरह से आबो दाना ढूँढ़ लेते हैं जो हैं ख़ाना बदोश अपना ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं तुम अपने दिल पे रख के हाथ छुप जाओ तो क्या होगा जो तीर अन्दाज़ हैं अपना निशाना ढूँढ़ लेते हैं हमारे अश्क तो बर्बाद होंगे ख़ाक पे गिर के वो रोने के लिए भी कोई शाना ढूँढ़ लेते हैं बुरा क्या है अगर हम मस्त हैं अपनी फ़क़ीरी में जो ऊंचे लोग हैं ऊंचा घराना ढूँढ़ लेते हैं मोहब्बत से जो अक्सर चूमते हैं माँ के क़दमों को वो दुनिया ही में जन्नत का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेते हैं हज़ारों ग़म हैं दिल में आँख में अश्कों का दरिया है मगर हँसने का हम फिर भी बहाना ढूँढ़ लेते हैं हैं हर जानिब मनाज़िर नफ़रतों के फिर भी ऐ काशिफ़ हम अहले दिल मोहब्बत का तराना ढूँढ़ लेते हैं — Kashif Adeeb Makanpuri
वो चाँद सा इक चेहरा सोने पे सुहागा है और उस पे है तिल काला सोने पे सुहागा है कुछ फ़र्क़ पड़ा उस पर बदली न रविश उस की दीवाना है और सहरा सोने पे सुहागा है बेहाल परीशाँ हूँ दुनिया का हूँ ठुकराया और मुझ पे तिरा हँसना सोने पे सुहागा है भाई की कलाई पर बाँधा है जो बहनों ने हाँ प्यार का ये धागा सोने पे सुहागा है वो जब भी कभी बोलें मोती से बरसते हैं और जादू भरा लहजा सोने पे सुहागा है है नाम तिरा लब पर आँखों में तिरी सूरत और सर पे तिरा साया सोने पे सुहागा है शीरीनी है लज़्ज़त है हर लफ़्ज़ अनोखा है ये उर्दू ज़बां भी क्या सोने पे सुहागा है ता'रीफ़ मैं कर पाऊँ किस तरह भला काशिफ़ वो शख़्स ही सरमाया सोने पे सुहागा है — Kashif Adeeb Makanpuri
उड़ने की तदबीर में उल्झे रहते हैं क़ैद में हैं ज़ंजीर में उल्झे रहते हैं बस तेरी यादें हैं सरमाया अपना हम अपनी जागीर में उल्झे रहते हैं सूरज से कुछ सीख नहीं लेते हैं लोग तारों की तनवीर में उल्झे रहते हैं दुनिया के रंगीन मनाज़िर क्या देखें हम तेरी तस्वीर में उल्झे रहते हैं कुछ बन जाते हैं तारीख़ ज़माने की कुछ अपनी तहरीर में उल्झे रहते हैं प्यार किया हम ने तो ये मालूम हुआ क्यूँँ सब रांझा हीर में उल्झे रहते हैं ख़्वाबों की तकमील से क्या मतलब हम को ख़्वाबों की ता'बीर में उल्झे रहते हैं क़ौम ने अपनी जिन को ज़िम्मेदारी दी वो अपनी तशहीर में उल्झे रहते हैं लफ़्ज़ों से क्या मतलब हम को ऐ काशिफ़ लहजे की तासीर में उल्झे रहते हैं — Kashif Adeeb Makanpuri
हर इक बुरी नज़र से बचा कीजिए हुज़ूर दिल में हमारे आप रहा कीजिए हुज़ूर काटें हम एक साथ सज़ा जिस की उम्र भर ऐसी कोई हसीन ख़ता कीजिए हुज़ूर पेचीदा मोड़ इश्क़ में आगे भी आएँगे यूँँ बात बात पर न डरा कीजिए हुज़ूर इन की नसीहतें किसी नेमत से कम नहीं कोई बड़ा कहे तो सुना कीजिए हुज़ूर इल्ज़ाम बे वफ़ाई का और मेरी ज़ात पर इस बात पर ज़रा तो हया कीजिए हुज़ूर अब अनक़रीब है मेरी क़िस्मत का फ़ैसला अब आप मेरे हक़ में दुआ कीजिए हुज़ूर पहली सी क्यूँँ दिलों में मोहब्बत नहीं रही इस बात का ख़ुद आप पता कीजिए हुज़ूर काशिफ़ को भी ख़ुमारे मोहब्बत की है तलाश बस एक जा में इश्क़ अता कीजिए हुज़ूर — Kashif Adeeb Makanpuri
करे जो क़ैद जुनूँ को वो जाल मत देना हो जिस में होश उसे ऐसा हाल मत देना जो मुझ सेे मिलने का तुम को कभी ख़याल आए तो इस ख़याल को तुम कल पे टाल मत देना जो उस को देखूं तो बस देखता रहूँ उस को अब उस के जैसा किसी को जमाल मत देना जुनूँ की रौ में जो दीवाना डगमगाये कभी तो ऐसे हाल में उस को सम्भाल मत देना तुम्हारी याद से ग़ाफ़िल मैं जिस सेे रहने लगूं मुझे तुम ऐसा हुनर या कमाल मत देना फ़िराक़े यार में ये बाइसे मसर्रत हैं तुम उन की यादों को दिल से निकाल मत देना ख़ुलूस बेच के दौलत कमाई हो जिस ने तुम ऐसे शख़्स की हम सेे मिसाल मत देना तुम ही ने बख़्शा है काशिफ़ को अपने इतना उरूज अब इस मुक़ाम पे ला कर ज़वाल मत देना — Kashif Adeeb Makanpuri
मिले अगर तुम्हें फ़ुर्सत हमारे शे'र सुनो भुला के सारी अदावत हमारे शे'र सुनो नए ख़याल नए ज़ाविये नए पहलू मिलेगी फ़िक्र को नुदरत हमारे शे'र सुनो हर एक रन्जो अलम दर्द भूल जाओगे करो जो इतनी सी ज़हमत हमारे शे'र सुनो किसी के दिल में जगह किस तरह बनानी है ये सीखने की हो चाहत हमारे शे'र सुनो फ़ज़ा में चारो तरफ़ नफ़रतों का राज है अब है वक़्त की ये ज़ुरुरत हमारे शे'र सुनो इन्हीं से फ़ैज़ उठाते हैं सारे दीवाने बदलना चाहो जो क़िस्मत हमारे शे'र सुनो ये तुम को जीने का उस वक़्त हौसला देंगे कि जब हो तुम पे मुसीबत हमारे शे'र सुनो इन्हीं ने दुनिया में पहचान हम को दी काशिफ़ हैं अपने वास्ते नेमत हमारे शे'र सुनो — Kashif Adeeb Makanpuri