fasla jab darmiyaan men apne apne rah gaya | फ़ासला जब दरमियां में अपने अपने रह गया

  - Kashif Adeeb Makanpuri

फ़ासला जब दरमियां में अपने अपने रह गया
हाएे फिर मेरा मुक़द्दर बनते बनते रह गया

डूबने लगता है सूरज की तरह हर आदमी
ख़ुद नुमाई का ये जज़्बा जैसे तैसे रह गया

'उम्र भर मुझको परीशाँ अब करेगा ये सवाल
कुछ तो था जो उसके लब पर आते आते रह गया

उस सेे मिलना था यक़ीनन बन्दिशों को तोड़कर
ऐन मुमकिन था ये होना होते होते रह गया

वक़्त की रफ़्तार ने बदली है करवट इस तरह
आगे आगे जो चला था पीछे पीछे रह गया

मिलती जुलती ही कहानी थी मेरी उस शख़्स से
वो मुझे और मैं उसे फिर सुनते सुनते रह गया

मिल गई मन्ज़िल किसी को अपनी काशिफ़ देखिये
और कोई मन्ज़िल की जानिब बढ़ते बढ़ते रह गया

  - Kashif Adeeb Makanpuri

Lab Shayari

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