उड़ने की तदबीर में उल्झे रहते हैं
क़ैद में हैं ज़ंजीर में उल्झे रहते हैं
बस तेरी यादें हैं सरमाया अपना
हम अपनी जागीर में उल्झे रहते हैं
सूरज से कुछ सीख नहीं लेते हैं लोग
तारों की तनवीर में उल्झे रहते हैं
दुनिया के रंगीन मनाज़िर क्या देखें
हम तेरी तस्वीर में उल्झे रहते हैं
कुछ बन जाते हैं तारीख़ ज़माने की
कुछ अपनी तहरीर में उल्झे रहते हैं
प्यार किया हमने तो ये मालूम हुआ
क्यूँँ सब रांझा हीर में उल्झे रहते हैं
ख़्वाबों की तकमील से क्या मतलब हमको
ख़्वाबों की ताबीर में उल्झे रहते हैं
क़ौम ने अपनी जिनको ज़िम्मेदारी दी
वो अपनी तशहीर में उल्झे रहते हैं
लफ़्ज़ों से क्या मतलब हमको ऐ काशिफ़
लहजे की तासीर में उल्झे रहते हैं
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