udne ki tadbeer men uljhe rahte hain | उड़ने की तदबीर में उल्झे रहते हैं

  - Kashif Adeeb Makanpuri

उड़ने की तदबीर में उल्झे रहते हैं
क़ैद में हैं ज़ंजीर में उल्झे रहते हैं

बस तेरी यादें हैं सरमाया अपना
हम अपनी जागीर में उल्झे रहते हैं

सूरज से कुछ सीख नहीं लेते हैं लोग
तारों की तनवीर में उल्झे रहते हैं

दुनिया के रंगीन मनाज़िर क्या देखें
हम तेरी तस्वीर में उल्झे रहते हैं

कुछ बन जाते हैं तारीख़ ज़माने की
कुछ अपनी तहरीर में उल्झे रहते हैं

प्यार किया हमने तो ये मालूम हुआ
क्यूँँ सब रांझा हीर में उल्झे रहते हैं

ख़्वाबों की तकमील से क्या मतलब हमको
ख़्वाबों की ताबीर में उल्झे रहते हैं

क़ौम ने अपनी जिनको ज़िम्मेदारी दी
वो अपनी तशहीर में उल्झे रहते हैं

लफ़्ज़ों से क्या मतलब हमको ऐ काशिफ़
लहजे की तासीर में उल्झे रहते हैं

  - Kashif Adeeb Makanpuri

Sooraj Shayari

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