परिंदे जिस तरह से आबो दाना ढूँढ़ लेते हैं

जो हैं ख़ाना बदोश अपना ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं

तुम अपने दिल पे रख के हाथ छुप जाओ तो क्या होगा
जो तीर अन्दाज़ हैं अपना निशाना ढूँढ़ लेते हैं

हमारे अश्क तो बर्बाद होंगे ख़ाक पे गिर के
वो रोने के लिए भी कोई शाना ढूँढ़ लेते हैं

बुरा क्या है अगर हम मस्त हैं अपनी फ़क़ीरी में
जो ऊंचे लोग हैं ऊंचा घराना ढूँढ़ लेते हैं

मोहब्बत से जो अक्सर चूमते हैं माँ के क़दमों को
वो दुनिया ही में जन्नत का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेते हैं

हज़ारों ग़म हैं दिल में आँख में अश्कों का दरिया है
मगर हँसने का हम फिर भी बहाना ढूँढ़ लेते हैं

हैं हर जानिब मनाज़िर नफ़रतों के फिर भी ऐ काशिफ़
हम अहले दिल मोहब्बत का तराना ढूँढ़ लेते हैं

— Kashif Adeeb Makanpuri

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