Shekhar Mandal

Shekhar Mandal

@Shekhar_uttarakhandi

Shekhar uttarakhandi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shekhar uttarakhandi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दिल-लगी ग़ैर ज़ात में कर के फँस गए जी-हुज़ूर हम दोनों — Shekhar Mandal
तेरे क़रीब रहते हुए जो ख़ुशी मिली उस को ही ज़िंदगी का सहारा बना लिया — Shekhar Mandal
मेरी तो तुझ से सिर्फ़ मोहब्बत की माँग थी क्या मिल गया तुझे मेरी इज़्ज़त उछाल कर — Shekhar Mandal
इक बशर का ही ख़्वाब है सारा इस से बढ़कर के ज़िंदगी क्या है — Shekhar Mandal
ख़ुदा ने क्यूँँ बनाया दिल का पैकर बनाया भी तो पागल क्यूँँ बनाया — Shekhar Mandal
इन अँधेरों से मुझे खेंच ले जा अपने साथ एक ही नुक्ते पे ठहरी है रवानी मेरी — Shekhar Mandal
कब तक शदीद दर्द उठाए फिरेंगे हम अब ख़ुशियों के कपाट को खुल जाना चाहिए — Shekhar Mandal
तस्वीर अर्से बा'द बदलती है सब्र रख ऐसा नहीं न होता कि सोचा बदल गया — Shekhar Mandal
असरार एक मुझ पे बहुत देर से खुला वो प्यार करता तो है जताता नहीं मुझे — Shekhar Mandal
नहीं होता कोई पल भर भी अपना उदासी उम्र भर की हो गई है — Shekhar Mandal
मेरी सिफ़ात पहले से सहमी हुई सी थी छोड़ो कभी किसी ने सताया नहीं मुझे — Shekhar Mandal
दिल करे या न करे फ़र्क़ नहीं पड़ता है अब तो ता-उम्र तअल्लुक़ को निभाना होगा — Shekhar Mandal
जगह ख़ाली नहीं रहती कभी भी तेरे जाते ही कोई आ रहा था — Shekhar Mandal
रात कटती है तिरी याद की चादर के तले और दिन जैसे कि दफ़्तर में निकल जाता है — Shekhar Mandal
वो नज़र की किताब पढ़ती है बात उन से छिपा नहीं सकते — Shekhar Mandal
उस पे यक़ीं न करते हुए भी करेंगे सब मासूम शक्ल से जो कहानी बताएगी — Shekhar Mandal
मेरे उलझे से ख़यालों में कहीं बसती हो सोच कर तुम को मिरा वक़्त निकल जाता है — Shekhar Mandal
ये तन्हाई भी बढ़ती जा रही थी जो दुनिया को समझता जा रहा था — Shekhar Mandal

Ghazal

तुझे इस से ज़ियादा और क्या दूँ तेरे पीछे जवानी ख़त्म कर दी — Shekhar Mandal
तेरे मेरे क़रीब आने के दिन हैं दिलों में आग सुलगाने के दिन हैं लगाओ दिल कि इतना सोचना क्या अभी तो भूल कर जाने के दिन हैं कि मुझ से दूर तुम क्यूँँ जा रहे हो यूँँ जाने के न तड़पाने के दिन हैं अजेंडा आज मज़हब का चला कर सभी में बैर करवाने के दिन हैं नई सी गंध फैला कर फ़ज़ा में पुरानी गंध हटवाने के दिन हैं अभी शादी के बंधन में न बांँधो हमारे नाचने गाने के दिन हैं ये दिल भरपूर शीशा हो गया है किसी पत्थर से टकराने के दिन हैं कभी तू दर्द ही मुझ को अता कर समझ के यार नज़राने के दिन हैं कि अपना हौसला मजबूत कर लो अभी तो ठोकरें खाने के दिन हैं अभी अहद-ए-जुनूँ का दबदबा है सभी हद से गुज़र जाने के दिन हैं कभी फुर्क़त में "शेखर" रोइएगा अभी तो चोट ही खाने के दिन हैं — Shekhar Mandal
क्यूँँ आज वो उल्फ़त का तलबगार नहीं है क्या बात हुई है जो परस्तार नहीं है जो अश्क को सस्ती सी रक़म में भी उठा ले बाज़ार में ऐसा तो ख़रीदार नहीं है कुछ लोग दग़ाबाज़ निकल जाते हैं ऐ दिल हर शख़्स मोहब्बत में वफ़ादार नहीं है तुम और कोई वज्ह ज़रा ढूँढ़ के लाओ ये दिल तो मिरा हुस्न का बीमार नहीं है हम देख चुके हश्र बहुत दिल को लगा कर यूँँही ये नज़र आज तो बेज़ार नहीं है अब और किसी ख़्वाब की तामीर न करना जब मान लिया प्यार ही संसार नहीं है इस आँख से दो अश्क छलक भी गए तो क्या रोना तो ब-ज़ाहिर मिरा किरदार नहीं है बारात तो चौखट पे पहुँच भी गई लेकिन इक और ये दुल्हन अभी तय्यार नहीं है तुम आज भी मिस्मार नज़र आते हो 'शेखर' तक़दीर के इस खेल का मेआ'र नहीं है — Shekhar Mandal
ये उम्र ख़ैर काट ही लेंगे किसी तरह लेकिन ये किस तरह से कटेगी पता नहीं — Shekhar Mandal

Nazm

"वो सच में ख़ुश है तो कोई बात नहीं" वो सच में ख़ुश है तो कोई बात नहीं जिस भी घर में जिस भी दिल में हो ख़ुश हो उस को ख़ुश भी न देखूँ ऐसी सिफ़ात नहीं लेकिन दिल से उस को भुलाने से पहले यादों का ये जज़ीरा तोड़ने से पहले मैं कुछ देर सलीक़े से जाँ रो तो लूँ दिल पे लगा जो रंग मलाल का धो तो लूँ अब से रोग नहीं ऐ दिल कुछ जोग नहीं यार के जाने का ऐ दिल कुछ सोग नहीं एक ही शख़्स नहीं दुनिया में मतवाले मंज़िल और भी है दूसरे मंज़िल को देख एक किनारा छूट गया तो क्या ही हुआ साहिल और भी है दूसरे साहिल को देख तेरे साथ जो औरों को भी रुला ही दे अब ऐसी हसरत का दीप बुझा ही दे दर्द-नुमा दिल छोड़ आ उस के आंगन में ऐ ना-शाद मुसाफ़िर झूम आ सावन में अब से रोग नहीं ऐ दिल कुछ जोग नहीं यार के जाने का ऐ दिल कुछ सोग नहीं वो सच में ख़ुश है तो कोई बात नहीं — Shekhar Mandal
"बात अधूरी ही छूट जाती है" आज भी बात अधूरी ही कहीं छोड़ न दूँ खो न जाऊँ कहीं उस हूर-शियम में फिर से गिर न जाऊँ कहीं उस गहरे से यम में फिर से दिल-फ़रेब और बड़ी मस्त सी चंचल आँखें बात कहते हुए सुनते हुए अक्सर मुझ को वश में कर लेती है ऐसी है ये छल-बल आँखें बात कहने ही नहीं देती है क्यूँँकर मुझ को क्या नहीं जानती है तेरी सुबुक-रौ आँखें रात दिन कितना परेशान सा रहता हूँ मैं चाहती क्या है भला तेरी गुल-ए-नौ आँखें क्यूँँ मुझे कहने नहीं देती जो कहता हूँ मैं कशमकश है कि अगर चश्म से बाहर आया तो तेरी ज़ुल्फ के इस ख़म में अटक जाऊँगा एक जंगल से निकल कर के अलग जंगल की ओर जाते हुए मैं राह भटक जाऊँगा और होगा वही जो होना लिखा किस्मत में वक़्त के साथ मैं सब कहने से थक जाऊँगा फिर यही होगा कि मैं भी किसी इक दिन तेरे पहलू से अचानक ही सरक जाऊँगा बात सब आधी-अधूरी ही रहेगी फिर भी मुझ को हर बात मुकम्मल ही लगेगी फिर भी — Shekhar Mandal