हर रात इक चराग़ जलाना पड़ा मुझे
ये रस्म ए-इंतिज़ार निभाना पड़ा मुझे
आई न लौट के तू मिरी जान इस लिए
हर सुब्ह इक चराग़ बुझाना पड़ा मुझे
तू मेरा हाल देख के रो देती इस लिए
हँस हँस के अपना हाल छुपाना पड़ा मुझे
इक अर्से से क़फ़स में परिंदा जो क़ैद था
उस को भी इंक़लाब सिखाना पड़ा मुझे
तुझ से वो एक बार मुझे 'इश्क़ क्या हुआ
ता-उम्र फिर तो अश्क बहाना पड़ा मुझे
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