दिल को किसी भी शाम मचलने नहीं दिया
तन्हाइयों के रंग में ढलने नहीं दिया
मैं हो गया हूँ क़ैद हज़ारों रिवाज़ में
मुझको मिरी ही ज़ात ने फलने नहीं दिया
दिल हिज्र में मचल तो रहा है बहुत मगर
दिल से ख़याल-ए-वस्ल निकलने नहीं दिया
था हर क़दम क़दम पे मिरा इम्तिहान और
मैं ने भी इम्हितान को टलने नहीं दिया
उस के हज़ारों रूप मैं ने देखे हैं तभी
उस की किसी भी बात को चलने नहीं दिया
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