रुख़ से उठा हिजाब ज़रा देर के लिए

खिल जाएगा गुलाब ज़रा देर के लिए

तू भी उलझ के बैठ न जाए मेरी तरह
पढ़ हुस्न की किताब ज़रा देर के लिए

उस ने हर एक राज़-ए-मोहब्बत बता दिया
जैसे चढ़ी शराब ज़रा देर के लिए

दुनिया जहान भूल गया वो तो ख़ुद-ब-ख़ुद
जिस पे चढ़ा शबाब ज़रा देर के लिए

आँखों में नींद लौट के आई नहीं कभी
देखा जो एक ख़्वाब ज़रा देर के लिए

'शेखर' ये इश्क़-विश्क़ बला क्या सवाल है
सोचो कभी जवाब ज़रा देर के लिए

— Shekhar Mandal

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