मुझे भी अपना ये दिल बे-क़रार करना था
सो सुब्ह शाम तिरा इंतिज़ार करना था
तेरी तरफ़ ये क़दम मेरे उठ भी सकते थे
मुझे भी ख़ुद पे ज़रा इख़्तियार करना था
तेरे ही सामने रूदाद-ए-दिल बता कर ऐ जाँ
तुझे भी थोड़ा सही सोगवार करना था
हज़ार ज़ख़्म भी गर बे-सबब दिए होते
मुझे तो फिर भी तिरा ऐ'तिबार करना था
खिजाँ की रुत में यही एक काम था 'शेखर'
चमन में बैठ के ज़िक्र-ए-बहार करना था
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