Pallav Mishra

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@pallav-mishra

Pallav Mishra shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Pallav Mishra's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal

Sher

मकीन-ए-दिल को ख़ानुमा-ख़राबियों से इश्क़ था क़याम ढूँढ़ता रहा तुम्हारी छत के बा'द भी — Pallav Mishra
आँसुओं में मिरे काँधे को डुबोने वाले पूछ तो ले कि मिरे जिस्म का सहरा है कहाँ — Pallav Mishra
मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ कर भटक रहा हूँ — Pallav Mishra
मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधे पे ले के ये घर भटक रहा हूँ — Pallav Mishra
तिरे लबों में मिरे यार ज़ाइक़ा नहीं है हज़ार बोसे हैं उन पर प इक दुआ नहीं है — Pallav Mishra
वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब तू मिरी बात के मफ़्हूम पे जाता है कहाँ — Pallav Mishra
शहर-ए-जाँ में वबाओं का इक दौर था मैं अदा-ए-तनफ़्फ़ुस में कमज़ोर था — Pallav Mishra
मैं चाहूँ तो उस सेे लिपट कर रो लूँ पर जग जाएगा वो तो और रुलाएगा — Pallav Mishra
मैं तुझ सेे मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ कर भटक रहा हूँ — Pallav Mishra
हमारा काम तो मौसम का ध्यान करना है और उस के बा'द के सब काम शश-जहात के हैं — Pallav Mishra
ये जिस्म तंग है सीने में भी लहू कम है दिल अब वो फूल है जिस में कि रंग-ओ-बू कम है — Pallav Mishra
मैं अपनी मौत से ख़ल्वत में मिलना चाहता हूँ सो मेरी नाव में बस मैं हूँ नाख़ुदा नहीं है — Pallav Mishra
तमाम फ़र्क़ मोहब्बत में एक बात के हैं वो अपनी ज़ात का नईं है हम उस की ज़ात के हैं — Pallav Mishra
तमाम होश ज़ब्त इल्म मस्लहत के बा'द भी फिर इक ख़ता मैं कर गया था माज़रत के बा'द भी — Pallav Mishra
ये तय हुआ था कि ख़ूब रोएँगे जब मिलेंगे अब उस के शाने पे सर है तो हँसते जा रहे हैं — Pallav Mishra
जाने क्या सोच के वो दिल से लगा ली मैं ने सर के ऊपर से जो इक बात गुज़र जानी थी — Pallav Mishra
मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ — Pallav Mishra

Ghazal

दुनिया-जहाँ के जाम छलक जाएँ रेत पर क्या कीजिए कि होंट बहक जाएँ रेत पर पानी की चाह भी हो समुंदर का ख़ौफ़ भी लहरों के साथ साथ हुमक जाएँ रेत पर गो लाख सीपियों में समुंदर की क़ैद हों मोती वही जो फिर भी झलक जाएँ रेत पर कासा हर इक सदफ़ का लुटा जाए अशरफ़ी ला'ल-ओ-जवाहरात खनक जाएँ रेत पर टुक आँख तू भी खोल कि दरिया के लब खुलें सातों दिशा के दाँत चमक जाएँ रेत पर छिन जाएँ रस के फ़र्श से धरती के ग़ार में और आसमाँ की छत से टपक जाएँ रेत पर रखिए सफ़र में सब की तन-आसानियों की ख़ैर ऐसा न हो कि घोड़े बिदक जाएँ रेत पर सरगोशियों की मौज कहाँ ले के जाएगी हम कुछ अगर जुनून में बक जाएँ रेत पर सूरज की आसमाँ पे सितारों को ढाँप ले ज़र्रों से आफ़्ताब दमक जाएँ रेत पर दिल की धड़कती ख़ाक से साहिल बनाइए पानी के पाँव आज थिरक जाएँ रेत पर — Pallav Mishra
सबात-ए -दिल था मगर बे-क़रार हो गया था वो नूर मेरी हरारत से नार हो गया था सबात दिल था मगर बे-क़रार हो गया था वो नूर मेरी हरारत से नार हो गया था हवा चली ही नहीं ऐ महाज़-ए-राहगुज़र वगर्ना ख़ाक का पुतला ग़ुबार हो गया था जब उस की धूप ने देखी हमारी सूर्यमुखी हमारा नाम गुलों में शुमार हो गया था कहाँ ख़बर थी कि ये मरहला भी मुश्किल है कि मैं तो पहली ही कोशिश में पार हो गया था पता चला कि कोई दिल था दिल के अंदर भी किसी का ग़म में मिरे इंतिशार हो गया था ख़ुनुक से क़त्ल हुई इक सदा-ए-तीर-कुशी बस इतनी बात थी मेरा शिकार हो गया था हज़ार हैफ़ के मुबहम हुई मिरी दुनिया हज़ार शुक्र कि तू आश्कार हो गया था हज़ार हैफ़ कि पज़मुर्दा हो गईं आँखें हज़ार शुक्र तिरा इंतिज़ार हो गया था — Pallav Mishra