लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर हम अपनी मिट्टी में कुछ रवानी बचा रहे थेउसे ख़बर भी नहीं हम उस शब ख़ामोश रह करबची हुई है जो इक कहानी बचा रहे थेये सोच किस दर्जा तिश्नगी से मरे थे हम लोगकि पानी पी नहीं रहे थे पानी बचा रहे थे— Pallav Mishra