क़रीब आने लगा वो तो रात गहरी हुई
वो रात ठहरी रही जब तलक दो-पहरी हुई
सबों ने अपने पियारों के लब चखे अलस्सुब्ह
गुज़ार कर शब-ए-हिज्राँ सबों की सहरी हुई
वो कौन होगा जो वापस न लौट पाएगा
है इंतिज़ार में इक रहगुज़ार ठहरी हुई
हमारे चेहरे की ज़र्दी पे हाथ रख उस ने
इक ऐसा रंग लगाया कि छब सुनहरी हुई
उड़ाए ख़ाक तो तारों से भर गए अफ़्लाक
बिछाए तार गरेबाँ के तो मसहरी हुई
ये जिस्म तंग है सीने में भी लहू कम है
दिल अब वो फूल है जिस में कि रंग-ओ-बू कम है
मैं अपनी मौत से ख़ल्वत में मिलना चाहता हूँ
सो मेरी नाव में बस मैं हूँ नाख़ुदा नहीं है
तमाम फ़र्क़ मोहब्बत में एक बात के हैं
वो अपनी ज़ात का नईं है हम उस की ज़ात के हैं
ये तय हुआ था कि ख़ूब रोएँगे जब मिलेंगे
अब उस के शाने पे सर है तो हँसते जा रहे हैं
कुछ ऐसे दो-जहाँ से राब्ता रक्खा गया है
कि इन ख़्वाबीदा आँखों को खुला रक्खा गया है
मिरी आँखों में अब तू रेत पाएगा न पानी
यहाँ दरिया न सहरा बस ख़ला रक्खा गया है
पस-ए-पर्दा गले मिल कर वो शायद रो पड़ेंगे
जिन्हें पूरी कहानी में जुदा रक्खा गया है
तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ
मैं बाद-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ
मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था
सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ
मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया
सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ
मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला
भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ
मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला
भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ