क़रीब आने लगा वो तो रात गहरी हुई
वो रात ठहरी रही जब तलक दो-पहरी हुई
वो रात ठहरी रही जब तलक दो-पहरी हुई
सबों ने अपने पियारों के लब चखे अलस्सुब्ह
गुज़ार कर शब-ए-हिज्राँ सबों की सहरी हुई
वो कौन होगा जो वापस न लौट पाएगा
है इंतिज़ार में इक रहगुज़ार ठहरी हुई
हमारे चेहरे की ज़र्दी पे हाथ रख उस ने
इक ऐसा रंग लगाया कि छब सुनहरी हुई
उड़ाए ख़ाक तो तारों से भर गए अफ़्लाक
बिछाए तार गरेबाँ के तो मसहरी हुई
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तिरे लबों में मिरे यार ज़ाइक़ा नहीं है
हज़ार बोसे हैं उन पर प इक दुआ नहीं है
हज़ार बोसे हैं उन पर प इक दुआ नहीं है
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मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था
सो तेरे घर के क़रीब आ कर भटक रहा हूँ
सो तेरे घर के क़रीब आ कर भटक रहा हूँ
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