नहीं था कोई गिला आग को रवानी से

हवा थी जिस ने लिया इंतिक़ाम पानी से

पयाम आते रहे जा-ए-ला-मकानी से
गया न कोई जवाब इस सरा-ए-फ़ानी से

कहाँ के दश्त क़दामत ही खो गई अब तो
पले-बढ़े हैं ये शहरों की मेहरबानी से

हयात फिर से चली लड़खड़ा के मस्ती में
सँभल गई थी किसी मर्ग-ए-ना-गहानी से

फहर के पाल खुली नाव की सर-ए-मस्तूल
सफ़ीर ताज़ा हुए बाद-ए-बादबानी से

हटा न लीजियो महफ़िल में मुझ से अपनी निगह
निशिस्ता हूँ मैं इसी बार की गिरानी से

जुनून मेरा करिश्मा है ऐ ख़ुदा मिरा नाम
जुदा ही रख किसी उम्मत की राएगानी से

— Pallav Mishra

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