kyun aaj vo ulfat ka talabgaar nahin hai | क्यूँँ आज वो उल्फ़त का तलबगार नहीं है

  - shaan manral

क्यूँँ आज वो उल्फ़त का तलबगार नहीं है
क्या बात हुई है जो परस्तार नहीं है

जो अश्क को सस्ती सी रकम में भी उठा ले
बाज़ार में ऐसा तो ख़रीदार नहीं है

कुछ लोग दग़ाबाज़ निकल जाते हैं ऐ दिल
हर शख़्स मोहब्बत में वफ़ादार नहीं है

तुम और कोई वज्ह ज़रा ढूँढ़ के लाओ
ये दिल तो मिरा हुस्न का बीमार नहीं है

हम देख चुके हश्र बहुत दिल को लगा कर
यूँँही ये नज़र आज तो बेज़ार नहीं है

अब और किसी ख़्वाब की तामीर न करना
जब मान लिया प्यार ही संसार नहीं है

इस आँख से दो अश्क छलक भी गए तो क्या
रोना तो बज़ाहिर मिरा किरदार नहीं है

बारात तो चौखट पे पहुँच भी गई लेकिन
इक और ये दुल्हन अभी तय्यार नहीं है

तुम आज भी मिस्मार नज़र आते हो 'शेखर'
तक़दीर के इस खेल का मेआ'र नहीं है

  - shaan manral

Kismat Shayari

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