Iftikhar Arif

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Iftikhar Arif shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Iftikhar Arif's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में — Iftikhar Arif
दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूँ कभी दुआ नहीं माँगी थी माँ के होते हुए — Iftikhar Arif
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं — Iftikhar Arif
घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम माँ के क़दमों में भी जन्नत नहीं मिलने वाली — Iftikhar Arif
मुंहदिम होता चला जाता है दिल साल-ब-साल ऐसा लगता है गिरह अब के बरस टूटती है — Iftikhar Arif
बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं — Iftikhar Arif

Ghazal

ख़ौफ़ के सैल-ए-मुसलसल से निकाले मुझे कोई मैं पयम्बर तो नहीं हूँ कि बचा ले मुझे कोई अपनी दुनिया के मह-ओ-मेहर समेटे सर-ए-शाम कर गया जादा-ए-फ़र्दा के हवाले मुझे कोई इतनी देर और तवक़्क़ुफ़ कि ये आँखें बुझ जाएँ किसी बे-नूर ख़राबे में उजाले मुझे कोई किस को फ़ुर्सत है कि ता'मीर करे अज़-सर-ए-नौ ख़ाना-ए-ख़्वाब के मलबे से निकाले मुझे कोई अब कहीं जा के समेटी है उमीदों की बिसात वर्ना इक उम्र की ज़िद थी कि सँभाले मुझे कोई क्या अजब ख़ेमा-ए-जाँ तेरी तनाबें कट जाएँ इस से पहले कि हवाओं में उछाले मुझे कोई कैसी ख़्वाहिश थी कि सोचो तो हँसी आती है जैसे मैं चाहूँ उसी तरह बना ले मुझे कोई तेरी मर्ज़ी मिरी तक़दीर कि तन्हा रह जाऊँ मगर इक आस तो दे पालने वाले मुझे कोई — Iftikhar Arif
ख़्वाब-ए-देरीना से रुख़्सत का सबब पूछते हैं चलिए पहले नहीं पूछा था तो अब पूछते हैं कैसे ख़ुश-तबा हैं इस शहर-ए-दिल-आज़ार के लोग मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़र जाती है तब पूछते हैं अहल-ए-दुनिया का तो क्या ज़िक्र कि दीवानों को साहिबान-ए-दिल-ए-शोरीदा भी कब पूछते हैं ख़ाक उड़ाती हुई रातें हों कि भीगे हुए दिन अव्वल-ए-सुब्ह के ग़म आख़िर-ए-शब पूछते हैं एक हम ही तो नहीं हैं जो उठाते हैं सवाल जितने हैं ख़ाक-बसर शहर के सब पूछते हैं यही मजबूर यही मोहर-ब-लब बे-आवाज़ पूछने पर कभी आएँ तो ग़ज़ब पूछते हैं करम-ए-मसनद-ओ-मिम्बर कि अब अरबाब-ए-हकम ज़ुल्म कर चुकते हैं तब मर्ज़ी-ए-रब पूछते हैं — Iftikhar Arif
ख़्वाब देखने वाली आँखें पत्थर होंगी तब सोचेंगे सुंदर कोमल ध्यान तितलियाँ बे-पर होंगी तब सोचेंगे रस बरसाने वाले बादल और तरफ़ क्यूँँ उड़ जाते हैं हरी-भरी शादाब खेतियाँ बंजर होंगी तब सोचेंगे बस्ती की दीवार पे किस ने अन-होनी बातें लिख दी हैं इस अनजाने डर की बातें घर घर होंगी तब सोचेंगे माँगे के फूलों से कब तक रूप-सरूप का मान बढ़ेगा अपने आँगन की महकारें बे-घर होंगी तब सोचेंगे बीती रुत की सब पहचानें भूल गए तो फिर क्या होगा गए दिनों की यादें जब बे-मंज़र होंगी तब सोचेंगे आने वाले कल का स्वागत कैसे होगा कौन करेगा जलते हुए सूरज की किरनें सर पर होंगी तब सोचेंगे — Iftikhar Arif
बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मिरा है आँखें भी मिरी ख़्वाब-ए-परेशाँ भी मिरा है जो डूबती जाती है वो कश्ती भी है मेरी जो टूटता जाता है वो पैमाँ भी मिरा है जो हाथ उठे थे वो सभी हाथ थे मेरे जो चाक हुआ है वो गिरेबाँ भी मिरा है जिस की कोई आवाज़ न पहचान न मंज़िल वो क़ाफ़िला-ए-बे-सर-ओ-सामाँ भी मिरा है वीराना-ए-मक़तल पे हिजाब आया तो इस बार ख़ुद चीख़ पड़ा मैं कि ये उनवाँ भी मिरा है वारफ़्तगी-ए-सुब्ह-ए-बशारत को ख़बर क्या अंदेशा-ए-सद-शाम-ए-ग़रीबाँ भी मिरा है मैं वारिस-ए-गुल हूँ कि नहीं हूँ मगर ऐ जान ख़मयाज़ा-ए-तौहीन-ए-बहाराँ भी मिरा है मिट्टी की गवाही से बड़ी दिल की गवाही यूँँ हो तो ये ज़ंजीर ये ज़िंदाँ भी मिरा है — Iftikhar Arif
कुछ भी नहीं कहीं नहीं ख़्वाब के इख़्तियार में रात गुज़ार दी गई सुब्ह के इंतिज़ार में बाब-ए-अता के सामने अहल-ए-कमाल का हुजूम जिन को था सर-कशी पे नाज़ वो भी इसी क़तार में जैसे फ़साद-ए-ख़ून से जिल्द-ए-बदन पे दाग़-ए-बर्स दिल की सियाहियाँ भी हैं दामन-ए-दाग़-दार में वक़्त की ठोकरों में है उक़दा-कुशाइयों को ज़ो'म कैसी उलझ रही है डोर नाख़ुन-ए-होश्यार में आएगा आएगा वो दिन हो के रहेगा सब हिसाब वक़्त भी इंतिज़ार में ख़ल्क़ भी इंतिज़ार में जैसी लगी थी दिल में आग वैसी ग़ज़ल बनी नहीं लफ़्ज़ ठहर नहीं सके दर्द की तेज़ धार में — Iftikhar Arif
हम अहल-ए-जब्र के नाम-ओ-नसब से वाक़िफ़ हैं सरों की फ़स्ल जब उतरी थी तब से वाक़िफ़ हैं कभी छुपे हुए ख़ंजर कभी खिंची हुई तेग़ सिपाह-ए-ज़ुल्म के एक एक ढब से वाक़िफ़ हैं वो जिन की दस्त-ख़तें महज़र-ए-सितम पे हैं सब्त हर उस अदीब हर उस बे-अदब से वाक़िफ़ हैं ये रात यूँँ ही तो दुश्मन नहीं हमारी कि हम दराज़ी-ए-शब-ए-ग़म के सबब से वाक़िफ़ हैं नज़र में रखते हैं अस्र-ए-बुलंद-बामी-ए-मेहर फ़ुरात-ए-जब्र के हर तिश्ना-लब से वाक़िफ़ हैं कोई नई तो नहीं हर्फ़-ए-हक़ की तन्हाई जो जानते हैं वो इस अम्र-ए-रब से वाक़िफ़ हैं — Iftikhar Arif
ग़ैरों से दाद-ए-जौर-ओ-जफ़ा ली गई तो क्या घर को जला के ख़ाक उड़ा दी गई तो क्या गारत-गरी-ए-शहर में शामिल है कौन कौन ये बात अहल-ए-शहर पे खुल भी गई तो क्या इक ख़्वाब ही तो था जो फ़रामोश हो गया इक याद ही तो थी जो भुला दी गई तो क्या मीसाक़-ए-ऐतबार में थी इक वफ़ा की शर्त इक शर्त ही तो थी जो उठा दी गई तो क्या क़ानून-ए-बाग़-बानी-ए-सहरा की सरनविश्त लिक्खी गई तो क्या जो न लिक्खी गई तो क्या इस क़हत-ओ-इंहदाम-ए-रिवायत के अहद में तालीफ़ नुस्ख़ा-हा-ए-वफ़ा की गई तो क्या जब 'मीर' ओ 'मीरज़ा' के सुख़न राएगाँ गए इक बे-हुनर की बात न समझी गई तो क्या — Iftikhar Arif
कोई मुज़्दा न बशारत न दुआ चाहती है रोज़ इक ताज़ा ख़बर ख़ल्क़-ए-ख़ुदा चाहती है मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़रनी थी सो वो भी गुज़री और क्या कूचा-ए-क़ातिल की हवा चाहती है शहर-ए-बे-मेहर में लब-बस्ता ग़ुलामों की क़तार नए आईन-ए-असीरी की बिना चाहती है कोई बोले के न बोले क़दम उट्ठें न उठें वो जो इक दिल में है दीवार उठा चाहती है हम भी लब्बैक कहें और फ़साना बन जाएँ कोई आवाज़ सर-ए-कोह-ए-निदा चाहती है यही लौ थी कि उलझती रही हर रात के साथ अब के ख़ुद अपनी हवाओं में बुझा चाहती है अहद-ए-आसूदगी-ए-जाँ में भी था जाँ से अज़ीज़ वो क़लम भी मिरे दुश्मन की अना चाहती है बहर-ए-पामाली-ए-गुल आई है और मौज-ए-ख़िज़ाँ गुफ़्तुगू में रविश-ए-बाद-ए-सबा चाहती है ख़ाक को हम-सर-ए-महताब किया रात की रात ख़ल्क़ अब भी वही नक़्श-ए-कफ़-ए-पा चाहती है — Iftikhar Arif
ये बस्तियाँ हैं कि मक़्तल दुआ किए जाएँ दुआ के दिन हैं मुसलसल दुआ किए जाएँ कोई फ़ुग़ाँ कोई नाला कोई बुका कोई बैन खुलेगा बाब-ए-मुक़फ़्फ़ल दुआ किए जाएँ ये इज़्तिराब ये लम्बा सफ़र ये तन्हाई ये रात और ये जंगल दुआ किए जाएँ बहाल हो के रहेगी फ़ज़ा-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ैर ये हब्स होगा मोअ'त्तल दुआ किए जाएँ गुज़िश्तगान-ए-मोहब्बत के ख़्वाब की सौगंद वो ख़्वाब होगा मुकम्मल दुआ किए जाएँ हवाए सरकश ओ सफ़्फ़ाक के मुक़ाबिल भी ये दिल बुझेंगे न मिशअल दुआ किए जाएँ ग़ुबार उड़ाती झुलसती हुई ज़मीनों पर उमँड के आएँगे बादल दुआ किए जाएँ क़ुबूल होना मुक़द्दर है हर्फ़-ए-ख़ालिस का हर एक आन हर इक पल दुआ किए जाएँ — Iftikhar Arif
वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बे-वफ़ाई में भी मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी लहू की आग में जल-बुझ गए बदन तो खुला रसाई में भी ख़सारा है ना-रसाई में भी बदलते रहते हैं मौसम गुज़रता रहता है वक़्त मगर ये दिल कि वहीं का वहीं जुदाई में भी लिहाज़-ए-हुर्मत-ए-पैमाँ न पास-ए-हम-ख़्वाबी अजब तरह के तसादुम थे आशनाई में भी मैं दस बरस से किसी ख़्वाब के अज़ाब में हूँ वही अज़ाब दर आया है इस दहाई में भी तसादुम-ए-दिल-ओ-दुनिया में दिल की हार के बा'द हिजाब आने लगा है ग़ज़ल-सराई में भी मैं जा रहा हूँ अब उस की तरफ़ उसी की तरफ़ जो मेरे साथ था मेरी शिकस्ता-पाई में भी — Iftikhar Arif
गली-कूचों में हंगामा बपा करना पड़ेगा जो दिल में है अब उस का तज़्किरा करना पड़ेगा नतीजा कर्बला से मुख़्तलिफ़ हो या वही हो मदीना छोड़ने का फ़ैसला करना पड़ेगा वो क्या मंज़िल जहाँ से रास्ते आगे निकल जाएँ सो अब फिर इक सफ़र का सिलसिला करना पड़ेगा लहू देने लगी है चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता सो इस बार भरी आँखों से ख़्वाबों को रिहा करना पड़ेगा मुबादा क़िस्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ ना-गुफ़्ता रह जाए नए मज़मून का लहजा नया करना पड़ेगा दरख़्तों पर समर आने से पहले आए थे फूल फलों के बा'द क्या होगा पता करना पड़ेगा गँवा बैठे तिरी ख़ातिर हम अपने महर ओ माहताब बता अब ऐ ज़माने और क्या करना पड़ेगा — Iftikhar Arif

Nazm

ख़्वाब-ए-ख़स-ख़ाना-ओ-बरफ़ाब के पीछे पीछे गर्मी-ए-शहर-ए-मुक़द्दर के सताए हुए लोग कैसी यख़-बस्ता ज़मीनों की तरफ़ आ निकले मौज-ए-ख़ूँ बर्फ़ हुई जाती है साँसें भी हैं बर्फ़ वहशतें जिन का मुक़द्दर थीं वो आँखें भी हैं बर्फ़ याद-ए-यारान-ए-दिल-आवेज़ का मंज़र भी है बर्फ़ एक इक नाम हर आवाज़ हर इक चेहरा बर्फ़ मुंजमिद ख़्वाब की टिकसाल का हर सिक्का बर्फ़ और अब सोचते हैं शाम-ओ-सहर सोचते हैं ख़्वाब-ए-ख़स-ख़ाना-ओ-बरफ़ाब से वो आग भली जिन के शोलों में भी क़िर्तास ओ क़लम ज़िंदा हैं जिस में हर अहद के हर नस्ल के ग़म ज़िंदा हैं ख़ाक हो कर भी ये लगता था कि हम ज़िंदा हैं — Iftikhar Arif
जबीन-ए-वक़्त पर लिक्खी हुई सच्चाइयाँ रौशन रही हैं ता-अबद रौशन रहेंगी ख़ुदा शाहिद है और वो ज़ात शाहिद है कि जो वज्ह-ए-असास-ए-अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ है और ख़ैर की तारीख़ का वो बाब-ए-अव्वल है अबद तक जिस का फ़ैज़ान-ए-करम जारी रहेगा यक़ीं के आगही के रौशनी के क़ाफ़िले हर दौर में आते रहे हैं ता-अबद आते रहेंगे अबू-तालिब के बेटे हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-रिसालत की रिवायत के अमीं थे जान देना जानते थे वो मुस्लिम हों कि वो अब्बास हों औन ओ मोहम्मद हों अली-अकबर हों क़ासिम हों अली-असग़र हों हक़ पहचानते थे लश्कर-ए-बातिल को कब गर्दानते थे अबू-तालिब के बेटे सर-बुरीदा हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं अबू-तालिब के बेटे पा-ब-जौलाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं अबू-तालिब के बेटे सर्फ़-ए-ज़िंदाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं मदीना हो नजफ़ हो कर्बला हो काज़िमैन ओ सामिरा हो मशहद ओ बग़दाद हो आल-ए-अबू-तालिब के क़दमों के निशाँ इंसानियत को उस की मंज़िल का पता देते रहे हैं ता-अबद देते रहेंगे अबू-तालिब के बेटों और ग़ुलामान-ए-अली-इब्न-ए-अबी-तालिब में इक निस्बत रही है मोहब्बत की ये निस्बत उम्र भर क़ाएम रहेगी ता-अबद क़ाएम रहेगी — Iftikhar Arif
अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए उसे रोकिए कि पड़ोसियों के घरों में झूले पड़े हुए हैं तो उस से क्या उसे क्या पड़ी कि कबूतरों को बताए कैसे हवाएँ उस की पतंग छीन के ले गईं 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए कहीं यूँँ न हो कि फिर एक बार भरी बहार में ए'तिबार के सारे ज़ख़्म महक उठें कहीं यूँँ न हो कि नए सिरे से हमारे ज़ख़्म महक उठें 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए — Iftikhar Arif
इक ख़्वाहिश थी कभी ऐसा हो कभी ऐसा हो कि अंधेरे में (जब दिल वहशत करता हो बहुत जब ग़म शिद्दत करता हो बहुत) कोई तीर चले कोई तीर चले जो तराज़ू हो मिरे सीने में इक ख़्वाहिश थी कभी ऐसा हो कभी ऐसा हो कि अंधेरे में (जब नींदें कम होती हों बहुत जब आँखें नम होती हों बहुत) सर-ए-आईना कोई शम्अ' जले कोई शम्अ' जले और बुझ जाए मगर अक्स रहे आईने में इक ख़्वाहिश थी वो ख़्वाहिश पूरी हो भी चुकी दिल जैसे देरीना दुश्मन की साज़िश पूरी हो भी चुकी और अब यूँँ है जीने और जीते रहने के बीच एक ख़्वाब की दूरी है वो दूरी ख़त्म नहीं होती और ये दूरी सब ख़्वाब देखने वालों की मजबूरी है मजबूरी ख़त्म नहीं होती — Iftikhar Arif
मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं और हर तरफ़ सुकून है सुकून ही सुकून है फ़ुग़ान-ए-ख़ल्क़ अहल-ए-ताइफ़ा की नज़्र हो गई मता-ए-सब्र वहशत-ए-दुआ की नज़्र हो गई उमीद-ए-अज्र बे-यक़ीनी-ए-जज़ा की नज़्र हो गई न ए'तिबार-ए-हर्फ़ है न आबरू-ए-ख़ून है सुकून ही सुकून है मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं और हर तरफ़ सुकून है सुकून ही सुकून है ख़लीज-ए-इक़्तिदार सरकशों से पाट दी गई जो हाथ आई दौलत-ए-ग़नीम बाँट दी गई तनाब-ए-ख़ेमा-ए-लिसान-ओ-लफ्ज़ काट दी गई फ़ज़ा वो है कि आरज़ू-ए-ख़ैर तक जुनून है सुकून ही सुकून है मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं और हर तरफ़ सुकून है सुकून ही सुकून है — Iftikhar Arif