Iftikhar Arif

Top 10 of Iftikhar Arif

    जबीन-ए-वक़्त पर लिक्खी हुई सच्चाइयाँ रौशन रही हैं
    ता-अबद रौशन रहेंगी
    ख़ुदा शाहिद है और वो ज़ात शाहिद है कि जो वज्ह-ए-असास-ए-अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ है
    और ख़ैर की तारीख़ का वो बाब-ए-अव्वल है
    अबद तक जिस का फ़ैज़ान-ए-करम जारी रहेगा
    यक़ीं के आगही के रौशनी के क़ाफ़िले हर दौर में आते रहे हैं
    ता-अबद आते रहेंगे
    अबू-तालिब के बेटे हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-रिसालत की रिवायत के अमीं थे
    जान देना जानते थे
    वो मुस्लिम हों कि वो अब्बास हों औन ओ मोहम्मद हों अली-अकबर हों क़ासिम हों अली-असग़र हों
    हक़ पहचानते थे
    लश्कर-ए-बातिल को कब गर्दानते थे
    अबू-तालिब के बेटे सर-बुरीदा हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं
    अबू-तालिब के बेटे पा-ब-जौलाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं
    अबू-तालिब के बेटे सर्फ़-ए-ज़िंदाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं
    मदीना हो नजफ़ हो कर्बला हो काज़िमैन ओ सामिरा हो मशहद ओ बग़दाद हो
    आल-ए-अबू-तालिब के क़दमों के निशाँ
    इंसानियत को उस की मंज़िल का पता देते रहे हैं ता-अबद देते रहेंगे
    अबू-तालिब के बेटों और ग़ुलामान-ए-अली-इब्न-ए-अबी-तालिब में इक निस्बत रही है
    मोहब्बत की ये निस्बत उम्र भर क़ाएम रहेगी
    ता-अबद क़ाएम रहेगी

    Iftikhar Arif
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    मिरी ज़िंदगी में बस इक किताब है इक चराग़ है
    एक ख़्वाब है और तुम हो
    ये किताब ओ ख़्वाब के दरमियान जो मंज़िलें हैं मैं चाहता था
    तुम्हारे साथ बसर करूँ
    यही कुल असासा-ए-ज़िंदगी है इसी को ज़ाद-ए-सफ़र करूँ
    किसी और सम्त नज़र करूँ तो मिरी दुआ में असर न हो
    मिरे दिल के जादा-ए-ख़ुश-ख़बर पे ब-जुज़ तुम्हारे कभी किसी का गुज़र न हो
    मगर इस तरह कि तुम्हें भी उस की ख़बर न हो

    Iftikhar Arif
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    बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मिरा है
    आँखें भी मिरी ख़्वाब-ए-परेशाँ भी मिरा है

    जो डूबती जाती है वो कश्ती भी है मेरी
    जो टूटता जाता है वो पैमाँ भी मिरा है

    जो हाथ उठे थे वो सभी हाथ थे मेरे
    जो चाक हुआ है वो गिरेबाँ भी मिरा है

    जिस की कोई आवाज़ न पहचान न मंज़िल
    वो क़ाफ़िला-ए-बे-सर-ओ-सामाँ भी मिरा है

    वीराना-ए-मक़तल पे हिजाब आया तो इस बार
    ख़ुद चीख़ पड़ा मैं कि ये उनवाँ भी मिरा है

    वारफ़्तगी-ए-सुब्ह-ए-बशारत को ख़बर क्या
    अंदेशा-ए-सद-शाम-ए-ग़रीबाँ भी मिरा है

    मैं वारिस-ए-गुल हूँ कि नहीं हूँ मगर ऐ जान
    ख़मयाज़ा-ए-तौहीन-ए-बहाराँ भी मिरा है

    मिट्टी की गवाही से बड़ी दिल की गवाही
    यूँ हो तो ये ज़ंजीर ये ज़िंदाँ भी मिरा है

    Iftikhar Arif
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    बिखर जाएँगे हम क्या जब तमाशा ख़त्म होगा
    मेरे मा'बूद आख़िर कब तमाशा ख़त्म होगा

    चराग़-ए-हुज्रा-ए-दर्वेश की बुझती हुई लौ
    हवा से कह गई है अब तमाशा ख़त्म होगा

    कहानी में नए किरदार शामिल हो गए हैं
    नहीं मा'लूम अब किस ढब तमाशा ख़त्म होगा

    कहानी आप उलझी है कि उलझाई गई है
    ये उक़्दा तब खुलेगा जब तमाशा ख़त्म होगा

    ज़मीं जब अद्ल से भर जाएगी नूरुन-अला-नूर
    ब-नाम-ए-मस्लक-ओ-मज़हब तमाशा ख़त्म होगा

    ये सब कठ-पुतलियाँ रक़्साँ रहेंगी रात की रात
    सहर से पहले पहले सब तमाशा ख़त्म होगा

    तमाशा करने वालों को ख़बर दी जा चुकी है
    कि पर्दा कब गिरेगा कब तमाशा ख़त्म होगा

    दिल-ए-ना-मुतमइन ऐसा भी क्या मायूस रहना
    जो ख़ल्क़ उट्ठी तो सब कर्तब तमाशा ख़त्म होगा

    Iftikhar Arif
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    दयार-ए-नूर में तीरा-शबों का साथी हो
    कोई तो हो जो मिरी वहशतों का साथी हो

    मैं उस से झूट भी बोलूँ तो मुझ से सच बोले
    मिरे मिज़ाज के सब मौसमों का साथी हो

    मैं उस के हाथ न आऊँ वो मेरा हो के रहे
    मैं गिर पड़ूँ तो मिरी पस्तियों का साथी हो

    वो मेरे नाम की निस्बत से मो'तबर ठहरे
    गली गली मिरी रुस्वाइयों का साथी हो

    करे कलाम जो मुझ से तो मेरे लहजे में
    मैं चुप रहूँ तो मेरे तेवरों का साथी हो

    मैं अपने आप को देखूँ वो मुझ को देखे जाए
    वो मेरे नफ़्स की गुमराहियों का साथी हो

    वो ख़्वाब देखे तो देखे मिरे हवाले से
    मिरे ख़याल के सब मंज़रों का साथी हो

    Iftikhar Arif
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    अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
    कि एक उम्र चले और घर नहीं आया

    उस एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझीं आँखें
    वो एक ख़्वाब कि अब तक नज़र नहीं आया

    करें तो किस से करें ना-रसाइयों का गिला
    सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया

    दिलों की बात बदन की ज़बाँ से कह देते
    ये चाहते थे मगर दिल इधर नहीं आया

    अजीब ही था मिरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़
    बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया

    हरीम-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी से निस्बतें भी रहीं
    मगर सलीक़ा-ए-अर्ज़-ए-हुनर नहीं आया

    Iftikhar Arif
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    मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
    मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे

    ये रौशनी के तआ'क़ुब में भागता हुआ दिन
    जो थक गया है तो अब इस को मुख़्तसर कर दे

    मैं ज़िंदगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत
    जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे

    सितारा-ए-सहरी डूबने को आया है
    ज़रा कोई मिरे सूरज को बा-ख़बर कर दे

    क़बीला-वार कमानें कड़कने वाली हैं
    मिरे लहू की गवाही मुझे निडर कर दे

    मैं अपने ख़्वाब से कट कर जियूँ तो मेरा ख़ुदा
    उजाड़ दे मिरी मिट्टी को दर-ब-दर कर दे

    मिरी ज़मीन मिरा आख़िरी हवाला है
    सो मैं रहूँ न रहूँ इस को बारवर कर दे

    Iftikhar Arif
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    ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
    ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

    घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
    शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

    डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताए
    ऐसी नद्दी में उतर जाने को जी चाहता है

    कभी मिल जाए तो रस्ते की थकन जाग पड़े
    ऐसी मंज़िल से गुज़र जाने को जी चाहता है

    वही पैमाँ जो कभी जी को ख़ुश आया था बहुत
    उसी पैमाँ से मुकर जाने को जी चाहता है

    Iftikhar Arif
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    ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
    फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं

    Iftikhar Arif
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    बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं
    और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं

    Iftikhar Arif
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