jabeen-e-waqt par likkhi hui sacchaaiyaan raushan rahi hain | जबीन-ए-वक़्त पर लिक्खी हुई सच्चाइयाँ रौशन रही हैं

  - Iftikhar Arif

जबीन-ए-वक़्त पर लिक्खी हुई सच्चाइयाँ रौशन रही हैं
ता-अबद रौशन रहेंगी
ख़ुदा शाहिद है और वो ज़ात शाहिद है कि जो वज्ह-ए-असास-ए-अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ है
और ख़ैर की तारीख़ का वो बाब-ए-अव्वल है
अबद तक जिस का फ़ैज़ान-ए-करम जारी रहेगा
यक़ीं के आगही के रौशनी के क़ाफ़िले हर दौर में आते रहे हैं
ता-अबद आते रहेंगे
अबू-तालिब के बेटे हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-रिसालत की रिवायत के अमीं थे
जान देना जानते थे
वो मुस्लिम हों कि वो अब्बास हों औन ओ मोहम्मद हों अली-अकबर हों क़ासिम हों अली-असग़र हों
हक़ पहचानते थे
लश्कर-ए-बातिल को कब गर्दानते थे
अबू-तालिब के बेटे सर-बुरीदा हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं
अबू-तालिब के बेटे पा-ब-जौलाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं
अबू-तालिब के बेटे सर्फ़-ए-ज़िंदाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैं
मदीना हो नजफ़ हो कर्बला हो काज़िमैन ओ सामिरा हो मशहद ओ बग़दाद हो
आल-ए-अबू-तालिब के क़दमों के निशाँ
इंसानियत को उस की मंज़िल का पता देते रहे हैं ता-अबद देते रहेंगे
अबू-तालिब के बेटों और ग़ुलामान-ए-अली-इब्न-ए-अबी-तालिब में इक निस्बत रही है
मोहब्बत की ये निस्बत 'उम्र भर क़ाएम रहेगी
ता-अबद क़ाएम रहेगी

  - Iftikhar Arif

Raushni Shayari

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