सितारों से भरा ये आसमाँ कैसा लगेगा
हमारे बा'द तुम को ये जहाँ कैसा लगेगा
थके-हारे हुए सूरज की भीगी रौशनी में
हवाओं से उलझता बादबाँ कैसा लगेगा
जमें क़दमों के नीचे से फिसलती जाएगी रेत
बिखर जाएगी जब उम्र-ए-रवाँ कैसा लगेगा
इसी मिट्टी में मिल जाएगी पूँजी 'उम्र भर की
गिरेगी जिस घड़ी दीवार-ए-जाँ कैसा लगेगा
बहुत इतरा रहे हो दिल की बाज़ी जीतने पर
ज़ियाँ बा'द अज़ ज़ियाँ बा'द अज़ ज़ियाँ कैसा लगेगा
वो जिस के बा'द होगी इक मुसलसल बे-नियाज़ी
घड़ी भर का वो सब शोर ओ फ़ुग़ाँ कैसा लगेगा
अभी से क्या बताएँ मर्ग-ए-मजनूँ की ख़बर पर
सुलूक-ए-कूचा-ए-ना-मेहरबाँ कैसा लगेगा
बताओ तो सही ऐ जान-ए-जाँ कैसा लगेगा
सितारों से भरा ये आसमाँ कैसा लगेगा
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Iftikhar Arif
our suggestion based on Iftikhar Arif
As you were reading Akhbaar Shayari Shayari