जैसा हूँ वैसा क्यूँँ हूँ समझा सकता था मैं
तुमने पूछा तो होता बतला सकता था मैं
आसूदा रहने की ख़्वाहिश मार गई वर्ना
आगे और बहुत आगे तक जा सकता था मैं
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शे'र
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं
जैसे सब लिखते रहते हैं ग़ज़लें नज़्में गीत
वैसे लिख लिख कर अम्बार लगा सकता था मैं
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