Mohammad Alvi

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Mohammad Alvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mohammad Alvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal

Sher

उस से मिले ज़माना हुआ लेकिन आज भी दिल से दुआ निकलती है ख़ुश हो जहाँ भी हो — Mohammad Alvi
हाए वो लोग जो देखे भी नहीं याद आएँ तो रुला देते हैं — Mohammad Alvi
थोड़ी सर्दी ज़रा सा नज़ला है शा'इरी का मिज़ाज पतला है — Mohammad Alvi
गुल-दान में गुलाब की कलियाँ महक उठीं कुर्सी ने उस को देख के आग़ोश वा किया — Mohammad Alvi
परिंदे दूर फ़ज़ाओं में खो गए 'अल्वी' उजाड़ उजाड़ दरख़्तों पे आशियाने थे — Mohammad Alvi
मौत न आई तो 'अल्वी' छुट्टी में घर जाएँगे — Mohammad Alvi
उस से मिले ज़माना हुआ लेकिन आज भी दिल से दुआ निकलती है ख़ुश हो जहाँ भी हो — Mohammad Alvi
आग अपने ही लगा सकते हैं ग़ैर तो सिर्फ़ हवा देते हैं — Mohammad Alvi
सदियों से किनारे पे खड़ा सूख रहा है इस शहर को दरिया में गिरा देना चाहिए — Mohammad Alvi
आग अपने ही लगा सकते हैं ग़ैर तो सिर्फ़ हवा देते हैं — Mohammad Alvi
'अल्वी' ये मो'जिज़ा है दिसम्बर की धूप का सारे मकान शहर के धोए हुए से हैं — Mohammad Alvi
इक याद रह गई है मगर वो भी कम नहीं इक दर्द रह गया है सो रखना सँभाल कर — Mohammad Alvi
खिड़कियों से झाँकती है रौशनी बत्तियाँ जलती हैं घर घर रात में — Mohammad Alvi
अब तो चुप-चाप शाम आती है पहले चिड़ियों के शोर होते थे — Mohammad Alvi
सोचने बैठें तो इस दुनिया में एक लम्हा न गुज़ारा जाए — Mohammad Alvi
नया साल दीवार पर टाँग दे पुराने बरस का कैलेंडर गिरा — Mohammad Alvi

Ghazal

दिन इक के बा'द एक गुज़रते हुए भी देख इक दिन तू अपने आप को मरते हुए भी देख हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुए भी देख हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल बाल पर तपते हुए ख़याल ठिठुरते हुए भी देख अपनों में रह के किस लिए सहमा हुआ है तू आ मुझ को दुश्मनों से न डरते हुए भी देख पैवंद बादलों के लगे देख जा-ब-जा बगलों को आसमान कतरते हुए भी देख हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर पानी में रौशनी को उतरते हुए भी देख उस को ख़बर नहीं है अभी अपने हुस्न की आईना दे के बनते-सँवरते हुए भी देख देखा न होगा तू ने मगर इंतिज़ार में चलते हुए समय को ठहरते हुए भी देख ता'रीफ़ सुन के दोस्त से 'अल्वी' तू ख़ुश न हो उस को तिरी बुराइयाँ करते हुए भी देख — Mohammad Alvi
अभी तो और भी दिन बारिशों के आने थे करिश्में सारे उसे आज ही दिखाने थे हिक़ारतें ही मिलीं हम को ज़ंग-आलूदा दिलों में यूँँ तो कई क़िस्म के ख़ज़ाने थे ये दश्त तेल का प्यासा न था ख़ुदा-वंदा यहाँ तो चार छे दरिया हमें बहाने थे किसी से कोई तअ'ल्लुक़ रहा न हो जैसे कुछ इस तरह से गुज़रते हुए ज़माने थे परिंदे दूर फ़ज़ाओं में खो गए 'अल्वी' उजाड़ उजाड़ दरख़्तों पे आशियाने थे किसी से कोई तअ'ल्लुक़ रहा न हो जैसे कुछ इस तरह से गुज़रते हुए ज़माने थे परिंदे दूर फ़ज़ाओं में खो गए 'अल्वी' उजाड़ उजाड़ दरख़्तों पे आशियाने थे — Mohammad Alvi