Tarun Bharadwaj

Tarun Bharadwaj

@Tahir

Tarun Bharadwaj shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Tarun Bharadwaj's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

इस तरह सिलसिला रहा बाक़ी रूठे रूठे जवाब आते रहे — Tarun Bharadwaj
अश्क आँखों में कब नहीं आता जब तू होता हैं तब नहीं आता — Tarun Bharadwaj
तुम्हारा रुख़, हँसी चेहरा हमें निपटा ही डालेगा तुम्हारी ज़ुल्फ़ का खुलना हमें निपटा ही डालेगा — Tarun Bharadwaj
ख़ुदा का ज़िक्र है वाइज़ की पारसाई है अगरचे धूम वहाँ रिंदों ने मचाई है — Tarun Bharadwaj
हवा से लोटेंगे उतरेगा जब नशा सबका ये कह के रिंद ने मय की हँसी उड़ाई है — Tarun Bharadwaj
मुझ को समझ रहा है तू शाइ'र फ़लाँ फ़लाँ अपनी ही बक रहा हूँ जो दुनिया से है मिला — Tarun Bharadwaj
परिंदे उड़ गए अब सिर्फ़ शाख़ बाक़ी है शरीर जल गए अब सिर्फ़ राख़ बाक़ी है — Tarun Bharadwaj
रातों को जागने लगा हूँ अब मेरे घर माहताब आने लगे — Tarun Bharadwaj
हमारा दिल किसी गहरी जुदाई के भँवर में है मिरी ये आँख फिर है नम कभी मिलने चले आओ — Tarun Bharadwaj
वो तभी पाया गया है पास में जब हमें यूँँ बेख़ुदी होने लगी — Tarun Bharadwaj
तेरी नज़रों का झुकना जबके बैचेनी बढ़ाता है तेरी नज़रों का तो उठना हमें निपटा ही डालेगा — Tarun Bharadwaj
चला है जोश में मक़्तल की ओर जोशीला उसी को देख के कितनों को अक़्ल आई है — Tarun Bharadwaj
तुम्हें भूल जाऊँ सही में न आँसू बहाऊँ सही में — Tarun Bharadwaj
कि 'ताहिर' यही है ज़माना न दिल तुम लगाना सही में — Tarun Bharadwaj
सारी नमी को सोख के सहरा को तर कर दूँ बादल बनूँ तो यूँँ बनूँ दरिया को तर कर दूँ — Tarun Bharadwaj
पढ़े-लिखे बालक तेरी क्या ज़िम्मेदारी है सामने भूखा बच्चा है और माँ दुखियारी है — Tarun Bharadwaj
वो अपने वादे का यूँॅं एहतराम करता है बस एक जुमले में क़िस्सा तमाम करता है — Tarun Bharadwaj

Ghazal

बड़ा वीरान है मौसम कभी मिलने चले आओ हर इक जानिब हैं घेरे ग़म कभी मिलने चले आओ यहाँ चारों तरफ़ लोगों की वैसे ख़ूब रौनक़ है मगर जैसे हो कोई कम कभी मिलने चले आओ तुम्हें गर इल्म है मेरे दिल-ए-वहशी के ज़ख़्मों का तुम्हारा वस्ल है मरहम कभी मिलने चले आओ अँधेरी रात गहराई इधर रोता ये तन्हा दिल दिए की लौ करूँँ मद्धम कभी मिलने चले आओ हवाओं और फूलों की नई ख़ुशबू रुलाती है नहीं आएगा ये मौसम कभी मिलने चले आओ लगी है चोट दिलपर क्या कहूँ मैं कैसे बतलाऊँ लगाने को ज़रा मरहम कभी मिलने चले आओ नहीं मैं जी सकूँगा बिन तुम्हारे जान इक पल भी तुम्हें कहता फिरूँ हर दम कभी मिलने चले आओ ज़माने की निगाहों ने हमें कितना डराया है नहीं होंगे जुदा तुम हम कभी मिलने चले आओ — Tarun Bharadwaj
साज़ हाथों में उठाओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ तुम नज़र मुझ से मिलाओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ ये है पैग़ाम-ए-मोहब्बत इसे छुप कर न सुनो तुम मिरे सामने आओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ दूर ही दूर जलाओ न मोहब्बत के चराग़ रौशनी बन के तुम आओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ तन्हा तन्हा सी नज़र आती है दुनिया मेरी तुम मिरे पास जो आओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ बारहा तुम ने सताया है मुझे रात और दिन मुझ को इतना न सताओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ हम हैं वो इश्क़ के पंछी जो ग़ज़ल कहते हैं तुम ग़ज़ल मुझ को सुनाओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ तुम को चाहा है तह-ए-दिल से यक़ीनन हम ने तुम मिरे दिल में समाओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ झूटे वा'दों से तसल्ली नहीं मिलती है 'तरूण' सच्चा आईना दिखाओ तो ग़ज़ल पेश करूँँ — Tarun Bharadwaj

Nazm