चला है जोश में मक़्तल की ओर जोशीला
उसी को देख के कितनों को अक़्ल आई है
उसी को देख के कितनों को अक़्ल आई है
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सुनता नहीं ये दिल मेरी कोई भी बात अब
मुझ से ख़फ़ा हुए हैं ये दिन-और-रात सब
मुझ से ख़फ़ा हुए हैं ये दिन-और-रात सब
कह दे कि तेरी सोच में मैं इक ख़याल हूँ
कह दे तू छोड़ती हूँ मैं भी तेरा साथ अब
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ज़िंदगी इस तरह कुछ अपनी बसर होती रही
चाह फूलों की थी काँटों पर गुज़र होती रही
चाह फूलों की थी काँटों पर गुज़र होती रही
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आने का वा'दा करो ऐसे न इनकार करो
है अगर इश्क़ तो फिर इश्क़ का इज़हार करो
है अगर इश्क़ तो फिर इश्क़ का इज़हार करो
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तुम तो थक कर बैठ गए हो मंज़िल कैसे पाओगे
तन्हा अँधेरी रात बहुत है कैसे दीप जलाओगे
तन्हा अँधेरी रात बहुत है कैसे दीप जलाओगे
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