ख़ुदा के गीत गाने लग गए हैं
ये मौसम गुनगुनाने लग गए हैं
सवेरा हो गया है वादियों में
परिंदे चहचहाने लग गए हैं
अँधेरे हो गए बेदार जब से
उजाले थरथराने लग गए हैं
मुहब्बत एक लम्हें में हुई थी
जताने में ज़माने लग गए हैं
दरो दीवार पर हम उँगलियों से
तेरी सूरत बनाने लग गए हैं
मेरा रब मुझ से राज़ी हो रहा है
परिंदे छत पे आने लग गए हैं
चलो अब मय-कदे की राह पकड़ें
क़दम फिर लड़खड़ाने लग गए हैं
— Tarun Bharadwaj















