bura manaaya tha har aahat har sargoshi ka | बुरा मनाया था हर आहट हर सरगोशी का

  - Khurram Afaq

बुरा मनाया था हर आहट हर सरगोशी का
सोचो कितना ध्यान रखा उसने ख़ामोशी का

तुम इसका नुक़सान बताती अच्छी लगती हो
वरना हम को शौक़ नहीं है सिगरेट-नोशी का

  - Khurram Afaq

Aahat Shayari

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    ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के

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    ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के

    वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन
    उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के

    वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता
    ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के

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    Khurram Afaq
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    बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं
    जो तेरे साथ उठते बैठते हैं

    अकेले बैठना होगा किसी को
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    और अब उठना पड़ा ना अगली सफ़ से
    कहा भी था कि पीछे बैठते हैं

    यहीं पर सिलसिला मौक़ूफ़ कर दो
    ज़ियादा तजरबे ले बैठते हैं

    निगाहें क्यूँ न ठहरें उस पे 'आफ़ाक़'
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    Khurram Afaq
    अब ऐसे ज़ाविए पर लौ रखी जाने लगी है
    चराग़ों के तले भी रोशनी जाने लगी है

    असासो के नए हक़दार पैदा हो रहे हैं
    वसीयत इसलिए जल्दी लिखी जाने लगी है

    नया पहलू सलीक़े से बयाँ करना पड़ेगा
    कहानी अब तवज्जोह से सुनी जाने लगी है

    सवाली इसलिए चुप चाप रुख़्सत हो रहे हैं
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    Khurram Afaq
    बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी
    हम निहत्थो पे उसने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी

    साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं
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    मेरे क़ाबू में हो कर भी वो इतना सरकश है तो सोचिए
    क्या बनेगा अगर मैंने उसकी लगामें खुली छोड़ दी

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