मैं कि जीवन का बोझ ढोता हूँ
सोच कर के उदास होता हूँ
जागता हूँ तो ख़ौफ़ आता है
इस लिए भी मैं इतना सोता हूँ
ग़म ही खाता हूँ ग़म ही पचता है
इस लिए ग़म के बीज बोता हूँ
मैं कि ऐसे उदास क्यूँ न रहूँ
मिलता कम है ज़ियादा खोता हूँ
जो तू बोले मैं भी वही बोलूँ
ये बता क्या मैं तेरा तोता हूँ
— Shekhar Mandal















