Nasir Kazmi

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@nasir-kazmi

Nasir Kazmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nasir Kazmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दिन भर तो मैं दुनिया के धंदों में खोया रहा जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आए — Nasir Kazmi
बस यूँँ ही दिल को तवक़्क़ो' सी है तुझ से वर्ना जानता हूँ कि मुक़द्दर है मेरा तन्हाई — Nasir Kazmi
जिन्हें हम देख कर जीते थे 'नासिर' वो लोग आँखों से ओझल हो गए हैं — Nasir Kazmi
मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाए बहुत दिनों से तबीअत मिरी उदास नहीं — Nasir Kazmi
जुदा हुए हैं बहुत लोग एक तुम भी सही अब इतनी बात पे क्या ज़िंदगी हराम करें — Nasir Kazmi
वो दिल-नवाज़ है लेकिन नज़र-शनास नहीं मिरा इलाज मिरे चारा-गर के पास नहीं — Nasir Kazmi
हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है — Nasir Kazmi
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का जो पिछली रात से याद आ रहा है — Nasir Kazmi
दिल धड़कने का सबब याद आया वो तिरी याद थी अब याद आया — Nasir Kazmi
कौन अच्छा है इस ज़माने में क्यूँँ किसी को बुरा कहे कोई — Nasir Kazmi
जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिए तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया — Nasir Kazmi
ज़रा सी बात सही तेरा याद आ जाना ज़रा सी बात बहुत देर तक रुलाती थी — Nasir Kazmi
आरज़ू है कि तू यहाँ आए और फिर उम्र भर न जाए कहीं — Nasir Kazmi
क़ुबूल है जिन्हें ग़म भी तेरी ख़ुशी के लिए वो जी रहे हैं हक़ीक़त में ज़िन्दगी के लिए — Nasir Kazmi
एक दम उस के होंट चूम लिए ये मुझे बैठे बैठे क्या सूझी — Nasir Kazmi
आज देखा है तुझ को देर के बा'द आज का दिन गुज़र न जाए कहीं — Nasir Kazmi
उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना यहाँ जो हादसे कल हो गए हैं — Nasir Kazmi
कहाँ है तू कि तिरे इंतिज़ार में ऐ दोस्त तमाम रात सुलगते हैं दिल के वीराने — Nasir Kazmi

Ghazal

सफ़र-ए-मंज़िल-ए-शब याद नहीं लोग रुख़्सत हुए कब याद नहीं अव्वलीं क़ुर्ब की सरशारी में कितने अरमाँ थे जो अब याद नहीं दिल में हर वक़्त चुभन रहती थी थी मुझे किस की तलब याद नहीं वो सितारा थी कि शबनम थी कि फूल एक सूरत थी अजब याद नहीं कैसी वीराँ है गुज़र-गाह-ए-ख़याल जब से वो आरिज़ ओ लब याद नहीं भूलते जाते हैं माज़ी के दयार याद आएँ भी तो सब याद नहीं ऐसा उलझा हूँ ग़म-ए-दुनिया में एक भी ख़्वाब-ए-तरब याद नहीं रिश्ता-ए-जाँ था कभी जिस का ख़याल उस की सूरत भी तो अब याद नहीं ये हक़ीक़त है कि अहबाब को हम याद ही कब थे जो अब याद नहीं याद है सैर-ए-चराग़ाँ 'नासिर' दिल के बुझने का सबब याद नहीं — Nasir Kazmi
जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है — Nasir Kazmi
नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ' जलाऊँ किस के लिए अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ' जलाऊँ किस के लिए — Nasir Kazmi
दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ अब आइने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक अलम-कशो उठो कि आफ़्ताब सर पे आ गया — Nasir Kazmi
दफ़्अ'तन दिल में किसी याद ने ली अँगड़ाई इस ख़राबे में ये दीवार कहाँ से आई आज खुलने ही को था दर्द-ए-मोहब्बत का भरम वो तो कहिए कि अचानक ही तिरी याद आई बस यूँँ ही दिल को तवक़्क़ो' सी है तुझ से वर्ना जानता हूँ कि मुक़द्दर है मिरा तन्हाई नश्शा-ए-तल्ख़ी-ए-अय्याम उतरता ही नहीं तेरी नज़रों ने गुलाबी तो बहुत छलकाई यूँँ तो हर शख़्स अकेला है भरी दुनिया में फिर भी हर दिल के मुक़द्दर में नहीं तन्हाई डूबते चाँद पे रोई हैं हज़ारों आँखें मैं तो रोया भी नहीं तुम को हँसी क्यूँँ आई रात भर जागते रहते हो भला क्यूँँ 'नासिर' तुम ने ये दौलत-ए-बेदार कहाँ से पाई — Nasir Kazmi
जबीं पे धूप सी आँखों में कुछ हया सी है तू अजनबी है मगर शक्ल आश्ना सी है ख़याल ही नहीं आता किसी मुसीबत का तिरे ख़याल में हर बात ग़म-रुबा सी है जहाँ में यूँँ तो किसे चैन है मगर प्यारे ये तेरे फूल से चेहरे पे क्यूँँ उदासी है दिल-ए-गमीं से भी जलते हैं शादमान-ए-हयात उसी चराग़ की अब शहर में हवा सी है हमीं से आँख चुराता है उस का हर ज़र्रा मगर ये ख़ाक हमारे ही ख़ूँ की प्यासी है उदास फिरता हूँ मैं जिस की धुन में बरसों से यूँँही सी है वो ख़ुशी बात वो ज़रा सी है चहकते बोलते शहरों को क्या हुआ 'नासिर' कि दिन को भी मिरे घर में वही उदासी है — Nasir Kazmi