जो गुफ़्तनी नहीं वो बात भी सुना दूँगा
तू एक बार तो मिल सब गिले मिटा दूँगा
तेरी गली में बहुत देर से खड़ा हूँ मगर
किसी ने पूछ लिया तो जवाब क्या दूँगा
यूँँ ही उदास रहा मैं तो देखना इक दिन
तमाम शहर में तन्हाइयाँ बिछा दूँगा
भुलाऊँगा न मिलूँगा न ख़त लिखूँगा तुझे
तेरी ख़ुशी के लिए ख़ुद को ये सज़ा दूँगा
वो दर्द ही न रहा वर्ना ऐ मता-ए-हयात
मुझे गुमाँ भी न था मैं तुझे भुला दूँगा
अभी तो रात है कुछ देर सो ही ले 'नासिर'
कोई बुलाएगा तो मैं तुझे जगा दूँगा
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