unhen sadiyon na bhulega zamaana | उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना

  - Nasir Kazmi

उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गए हैं

  - Nasir Kazmi

Azal Shayari

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    अज़ल से मेरी हिफ़ाज़त का फ़र्ज़ है उन पर
    सभी दुखों को मेरे आस-पास होना है
    Rahul Jha
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    सदियों से किनारे पे खड़ा सूख रहा है
    इस शहर को दरिया में गिरा देना चाहिए
    Mohammad Alvi
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    दिल-ओ-नज़र को अभी तक वो दे रहे हैं फ़रेब
    तसव्वुरात-ए-कुहन के क़दीम बुत-ख़ाने
    Ali Sardar Jafri
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    मैं तो मुश्ताक़ हूँ उस दिन का अज़ल से 'ज़ामी'
    कब बपा हश्र हो कब उन का मैं जल्वा देखूँ
    Parvez Zaami
    मुमकिन है कि सदियों भी नज़र आए न सूरज
    इस बार अंधेरा मिरे अंदर से उठा है
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    ख़ुश्बू की बरसात नहीं कर पाते हैं
    हम ख़ुद ही शुरुआत नहीं कर पाते हैं

    जिस लड़की की बातें करते हैं सबसे
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    Gyan Prakash Akul
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    मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद'
    और सदियों का सफ़र था मुझ में
    Ahmad Khayal
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    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
    Allama Iqbal
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    सारे दुख सो जाएँगे लेकिन इक ऐसा ग़म भी है
    जो मिरे बिस्तर पे सदियों का सफ़र रख जाएगा
    Azm Shakri
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    बात से बात बनेगी तू कभी बात तो कर
    आ ज़रा पास मिरे यार मुलाक़ात तो कर

    पूछ तू भी तो कभी हाल हमारे दिल का
    हाल से हाल मिलाने की शुरूआत तो कर
    Read Full
    shaan manral

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    क़ुबूल है जिन्हें ग़म भी तेरी ख़ुशी के लिए
    वो जी रहे हैं हक़ीक़त में ज़िन्दगी के लिए
    Nasir Kazmi
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    जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिए
    तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया
    Nasir Kazmi
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    'नासिर' क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है
    दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है

    कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा
    रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है

    कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जाएगा लहू
    नाम-ए-ख़ुदा हो जवान अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है

    क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं
    अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है

    कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिए
    रात बहुत काली है 'नासिर' घर में रहो तो बेहतर है
    Read Full
    Nasir Kazmi
    नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए
    वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए

    जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई
    इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए

    वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था
    अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए

    अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं
    ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए

    मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा
    इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ जलाऊँ किस के लिए

    अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं
    ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए

    मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा
    इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ जलाऊँ किस के लिए
    Read Full
    Nasir Kazmi
    जिन्हें हम देख कर जीते थे 'नासिर'
    वो लोग आँखों से ओझल हो गए हैं
    Nasir Kazmi
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