इतनी भी बे-रुख़ी नहीं होती
जो किसी की कमी नहीं होती
वो मिरा नाम तक नहीं लेता
उस से तो भूल भी नहीं होती
चार-सू में हो और दिल में न हो
वो ख़ुशी तो ख़ुशी नहीं होती
बारहा हादसे न होते तो
ये अजब ख़ामुशी नहीं होती
ये ग़ज़ल नज़्म कैसे कहता मैं
जो मोहब्बत हुई नहीं होती
— Shekhar Mandal















