"बात अधूरी ही छूट जाती है"
आज भी बात अधूरी ही कहीं छोड़ न दूँ
खो न जाऊँ कहीं उस हूर-शियम में फिर से
गिर न जाऊँ कहीं उस गहरे से यम में फिर से
दिल-फ़रेब और बड़ी मस्त सी चंचल आँखें
बात कहते हुए सुनते हुए अक्सर मुझ को
वश में कर लेती है ऐसी है ये छल-बल आँखें
बात कहने ही नहीं देती है क्यूँकर मुझ को
क्या नहीं जानती है तेरी सुबुक-रौ आँखें
रात दिन कितना परेशान सा रहता हूँ मैं
चाहती क्या है भला तेरी गुल-ए-नौ आँखें
क्यूँ मुझे कहने नहीं देती जो कहता हूँ मैं
कशमकश है कि अगर चश्म से बाहर आया
तो तेरी ज़ुल्फ के इस ख़म में अटक जाऊँगा
एक जंगल से निकल कर के अलग जंगल की
ओर जाते हुए मैं राह भटक जाऊँगा
और होगा वही जो होना लिखा किस्मत में
वक़्त के साथ मैं सब कहने से थक जाऊँगा
फिर यही होगा कि मैं भी किसी इक दिन
तेरे पहलू से अचानक ही सरक जाऊँगा
बात सब आधी-अधूरी ही रहेगी फिर भी
मुझ को हर बात मुकम्मल ही लगेगी फिर भी















