तमाम उम्र के लम्हात पेश करते हुए
ग़ज़ल सुनाइए जज़्बात पेश करते हुए
कभी किसी न किसी राह पर मिलेंगे फिर
हम एक से ही ख़यालात पेश करते हुए
तेरी ज़बान बहुत लड़खड़ा रही है दोस्त
मेरे ख़िलाफ़ शिकायात पेश करते हुए
मुझे हिसाब से बाहर का दर्द दे जाओ
शब-ए-फ़िराक़ की सौग़ात पेश करते हुए
किसी को इतना सताओ नहीं कि काँप उठे
वो अपने माज़ी के हालात पेश करते
— Shekhar Mandal















