Hasan Raqim

Hasan Raqim

@Hasanrmalik

Hasan Raqim shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hasan Raqim's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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  • Sher(66)
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Sher

अपनी आदत है अगर होना तो बस एक दिल का कहने वाले इसी आदत को वफ़ा कहते हैं — Hasan Raqim
जीने भी नहीं देता मरने भी नहीं देता न प्यार करे है ख़ुद करने भी नहीं देता — Hasan Raqim
न यार-दोस्त, मोहब्बत न दिल, मैं उस के बा'द किसी का कुछ भी किसी भी तरह हुआ ही नहीं — Hasan Raqim
मुसीबतों में तो याद करते ही हैं किसी को ये लोग सारे मगर कभी जो सुकूँ में आए ख़याल मेरा तो लौट आना — Hasan Raqim
ये जिस आग की बात तुम कर रहे हो तुम उस आग का तो धुआँ भी नहीं हो — Hasan Raqim
किसी की मंज़िलों का अक्स बनके भी तो देख किसी को रास्ता होकर गुज़र भी जाने दे — Hasan Raqim
परों को खोलने के एक मौक़े' की ज़रुरत है फिर उड़ने वालों को ये आसमाँ ऊँचा नहीं लगता — Hasan Raqim
लिखा था जिस के मुक़द्दर में वो, उसी का हुआ वो मेरा होना नहीं था मेरा हुआ भी नहीं — Hasan Raqim
जहाँ सब सितारों से करते हैं बातें वहीं रहता हूँ मैं वहीं घर है मेरा — Hasan Raqim
तुझे खो कर ये अंदाज़ा हुआ मैं तेरे साए का पीछा कर रहा था — Hasan Raqim
वो कहता था कि आएगा ज़माना अपने मिलने का, ज़माना हो गया यारों ज़माना होते होते भी — Hasan Raqim
आप ने सब समझ लिया लेकिन आप ने दिल को दिल नहीं समझा — Hasan Raqim
वो मेरे बा'द सभी का ही हो गया देखो मैं जिस के बा'द किसी और का हुआ ही नहीं — Hasan Raqim
वो क्या लगता है मेरा ये बताते दिन हो जाना है ये बेहतर है कि तुम पूछो वो मेरा क्या नहीं लगता — Hasan Raqim
न हाथ आगे करूँँ सामने सिवाए तेरे न इतना देना कि मुझ को ग़ुरूर आ जाए — Hasan Raqim
अब इस सेे बढ़के कोई मो'जिज़ा भला क्या हो कि लोग इश्क़ में मरते हैं और मरते नहीं — Hasan Raqim
असर ये माँ की दु'आओं का ही तो है ऐ दोस्त कि होते होते कोई हादसा नहीं होता — Hasan Raqim

Ghazal

तो क्या गर वो दिलों में फ़ासलों को छोड़ जाते हैं सभी गाहक ही टूटे आइनों को छोड़ जाते हैं हमारे कहने पे तो जंग का क़तरा नहीं रुकता तुम्हारे कहने पे दुश्मन सफ़ों को छोड़ जाते हैं मुझे पतझड़ के मौसम ने सिखाया हिज्र का मतलब कि कैसे सूखे पत्ते टहनियों को छोड़ जाते हैं नए शहरों में बच्चों के लिए घर लेते हैं माँ बाप वही बच्चे बड़े होकर घरों को छोड़ जाते हैं खिलौने पाने की नाकाम हसरत से भरे बच्चे चले जाते हैं मेलों से दिलों को छोड़ जाते हैं पुरानी यादों के बाग़ीचे को जब याद करते हैं वो काँटे बीन लेते हैं गुलों को छोड़ जाते हैं जहाँ कुछ भी नहीं बचता वहाँ ढूँढा करो मुझ को घरों को तोड़ते तूफ़ाँ दियों को छोड़ जाते हैं — Hasan Raqim

Nazm

"सूखा हुआ दरख़्त और मैं" और फिर ये सूखा हुआ दरख़्त मानों आज हमारे हिज्र से उदास हो इस की टहनियाँ दो दिलों के अलग होने पे सूख रहीं हैं जिस तरह कोई सब्ज़ बाग़ भी बारिश से जुदा होने पर सहरा हो जाता है तुम्हें वो दरख़्त याद है नवही दरख़्त जिस के नीचे हम ने कभी जुदा न होने के अहद लिए थे मैं आज भी उस दरख़्त के नीचे बैठा तुम्हारा इंतिज़ार देखता हूँ इस उमीद में की शायद किसी दिन तमाम यादों के साथ तुम भी लौट आओगे और हम इक दफ़ा फिर मिल सकेंगे कितने नादान थे हम की सोचते थे वक़्त ओ हालात हमारे हाथ में हैं मगर आज उसी दरख़्त के नीचे अकेला हूँ तो सोचता हूँ की इंसान तो महज़ हालातों की क़ैद में जकड़ा हुआ है ये सच है की तुम्हारा लौट आना मुमकिन नहीं है मगर दिल है की मानने से कतरा रहा है ये कैसी मुश्किल में तुम मुझ को डाल गए हो तुम्हारे बग़ैर न दिन कट रहें हैं न रातें, न तुम हो न तुम्हारा अक्स अगर कुछ है तो हिज्र, तन्हाई, और ग़म वही ग़म जिस से, तुम मेरी सलामती की दुआ किया करती थीं — Hasan Raqim
"उस के नाम का पत्थर" इस शहर से दूर एक सहरा है जिस में एक दरिया के किनारे पर मैं बैठा राह तकता हूँ तुम्हारी कब तुम आजाओ किसी पल और देखो आज कुछ ऐसा हुआ है जिस से सब हैरत में हैं ये पेड़ की सूखी हुई टेहनी पे बैठे पंछियों में अफ़रा तफ़री सी मची है रेत जैसे इन हवाओं की धुनों में झूमती हो और मुझ सेे पूछती हो कौन है वो जिस की यादों में मैं रोज़ाना यहाँ आ कर के पत्थर फेंकता हूँ? मैं मगर चुप हूँ तुम्हारी राह तकता हूँ मन ही मन में मैं ये कहते हुए मुस्कान भरता हूँ शहर से दूर एक सहरा के बीचो बीच में गर तुम चले आओ किसी दिन तो तुम्हें भी मैं दिखाऊँगा वो दरिया जिस में उस के नाम का पत्थर नहीं डूबा — Hasan Raqim