मैं इस दयार में तो कभी उस दयार में

भटका कहाँ नहीं हूँ तेरे इंतिज़ार में

गुज़रे तो उस के साथ में गुज़रे, कि उस बग़ैर
कैसे भला लगेगा दिल अपना बहार में

इक तो वो उस के साथ था ऊपर से ख़ुश भी था
क्या कुछ नहीं है देखा इस इक तरफ़ा प्यार में

तुझ को बसा लिया है ग़ज़ल, गीत, नज़्म में
लिख दी है इक किताब तेरी यादगार में

— Hasan Raqim

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