Haidar Ali Aatish

Haidar Ali Aatish

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Lucknow· India

Haidar Ali Aatish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Haidar Ali Aatish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उठ गई हैं सामने से कैसी कैसी सूरतें रोइए किस के लिए किस किस का मातम कीजिए — Haidar Ali Aatish
कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवा हसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया — Haidar Ali Aatish
न पूछ हाल मिरा चोब-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ लगा के आग मुझे कारवाँ रवाना हुआ — Haidar Ali Aatish
बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को — Haidar Ali Aatish

Ghazal

पयम्बर मैं नहीं आशिक़ हूँ जानी रहे मूसी ही से ये लन-तरानी सुलैमाँ हम हैं ऐ महबूब-ए-जानी समझते हैं तुझे बिल्क़ीस-ए-सानी खुला सौदे में उन ज़ुल्फ़ों के मर कर परेशाँ ख़्वाब थी ये ज़िंदगानी ये क्यूँँ आता है उन से क़द-कुशी को गड़ी जाती है सर्व-ए-बोस्तानी वही देगा कबाब-ए-नर्गिसी भी जो देता है शराब-ए-अर्ग़वानी रंगा है इश्क़ ने किस दर्द-ए-सर से हमारा जामा-ए-तन ज़ा'फ़रानी मुसाफ़िर की तरह रह ख़ाना-बर-दोश नहीं जाए-ए-इक़ामत दार-ए-फ़ानी तिरे कूचे के मुश्ताक़ों के आगे जहन्नम है बहिश्त-ए-आसमानी वो मय-कश हूँ दिया है क़ाबला ने जिसे ग़ुस्ल-ए-शराब-ए-अर्ग़वानी यक़ीं है दीदा-ए-बारीक-बीं को करे ऐनक तलब ये ना-तवानी वो ख़त है यादगार-ए-हुस्न-ए-रफ़्ता वो सब्ज़ा है गुलिस्ताँ की निशानी निकलती मुँह से क़ासिद के नहीं बात मगर लाया है पैग़ाम-ए-ज़बानी ये मुश्त-ए-ख़ाक हो मक़्बूल-ए-दरगाह सबा की चाहता हूँ मेहरबानी लिए हैं बोसा-ए-रुख़्सार-ए-साफ़ पिया है हम ने आईने का पानी सफ़ेदी मू की हो काफ़ूर हर-चंद कोई मिटता है ये दाग़-ए-जवानी न ख़ुश हो फ़रबही-ए-तन से ग़ाफ़िल सुबुक करती है मुर्दे को गिरानी मुए जो पेशतर मरने से वो लोग कफ़न समझे क़बा-ए-ज़िंदगानी जलाती है दिल 'आतिश' तूर की तरह किसी पर्दा-नशीं की लन-तरानी — Haidar Ali Aatish
हुस्न किस रोज़ हम से साफ़ हुआ गुनह-ए-इश्क़ कब मुआ'फ़ हुआ ले लिया शुक्र कर के साक़ी से दर्द इस में हुआ कि साफ़ हुआ तेग़-ए-क़ातिल पर अपना ख़ून जम कर मख़मल-ए-सुर्ख़ का ग़िलाफ़ हुआ ज़हर परहेज़ हो गया मुझ को दर्द दरमाँ से अलमुज़ाफ़ हुआ ख़ाकसारी की हो चुकी मे'राज सीना अपना ज़मीन-ए-साफ़ हुआ कमर-ए-यार ने दिखाई आँख मर्दुम-दीदा ख़ाल-ए-नाफ़ हुआ वा'दा झूटा नकर्दा मर्द नहीं क़ौल से फ़े'अल जब ख़िलाफ़ हुआ फ़ातिहा को जो वो परी आई संग-ए-क़ब्र अपना कोह-ए-क़ाफ़ हुआ उस कमर के सुबूत में आजिज़ फ़िक्र कर कर के मूशिगाफ़ हुआ रिंद-मशरब हूँ मुझ को क्या होवे मज़हबों में जो इख़्तिलाफ़ हुआ वो दहन हूँ न निकला हर्फ़-ए-ग़ुरूर वो ज़बाँ हूँ न जिस से लाफ़ हुआ गिर्द इस कूचा के फिरा 'आतिश' हाजी से का'बा का तवाफ़ हुआ — Haidar Ali Aatish
मिरे दिल को शौक़-ए-फ़ुग़ाँ नहीं मिरे लब तक आती दुआ नहीं वो दहन हूँ जिस में ज़बाँ नहीं वो जरस हूँ जिस में सदा नहीं न तुझे दिमाग़-ए-निगाह है न किसी को ताब-ए-जमाल है उन्हें किस तरह से दिखाऊँ मैं वो जो कहते हैं कि ख़ुदा नहीं किसे नींद आती है ऐ सनम तिरे ताक़-ए-अबरू की याद में कभी आश्ना-ए-तह-ए-बग़ल सर-ए-मुर्ग़-ए-क़िबला-नुमा नहीं अजब इस का क्या न समाउँ मैं जो ख़याल-ए-दुश्मन-ओ-दोस्त है वो मक़ाम हूँ कि गुज़र नहीं वो मकान हूँ कि पता नहीं ये ख़िलाफ़ हो गया आसमाँ ये हवा ज़माने की फिर गई कहीं गुल खिले भी तो बूँद से कहीं हुस्न है तो वफ़ा नहीं मरज़-ए-जुदाई-ए-यार ने ये बिगाड़ दी है हमारी ख़ू कि मुआफ़िक़ अपने मिज़ाज के नज़र आती कोई दवा नहीं मुझे ज़ाफ़रान से ज़र्द-तर ग़म-ए-हिज्र-ए-यार ने कर दिया नहीं ऐसा कोई ज़माने में मिरे हाल पर जो हँसा नहीं मिरे आगे उस को फ़रोग़ हो ये मजाल क्या है रक़ीब की ये हुजूम-ए-जल्वा-ए-यार है कि चराग़-ए-ख़ाना को जा नहीं चलें गो कि सैकड़ों आँधियाँ जलें गरचे लाख घर ऐ फ़लक भड़क उट्ठे 'आतिश'-ए-तूर फिर कोई इस तरह की दवा नहीं — Haidar Ali Aatish
वहशत-ए-दिल ने किया है वो बयाबाँ पैदा सैकड़ों कोस नहीं सूरत-ए-इंसाँ पैदा सहर-ए-वस्ल करेगी शब-ए-हिज्राँ पैदा सुल्ब-ए-काफ़िर ही से होता है मुसलमाँ पैदा दिल के आईने में कर जौहर-ए-पिन्हाँ पैदा दर-ओ-दीवार से हो सूरत-ए-जानाँ पैदा ख़ार दामन से उलझते हैं बहार आई है चाक करने को किया गुल ने गरेबाँ पैदा निस्बत उस दस्त-ए-निगारीं से नहीं कुछ इस को ये कलाई तो करे पंजा-ए-मर्जां पैदा नश्शा-ए-मय में खुली दुश्मनी-ए-दोस्त मुझे आब-ए-अंगूर ने की आतिश-ए-पिन्हाँ पैदा बाग़ सुनसान न कर इन को पकड़ कर सय्याद बा'द मुद्दत हुए हैं मुर्ग़-ए-ख़ुश-इल्हाँ पैदा अब क़दम से है मिरे ख़ाना-ए-ज़ंजीर आबाद मुझ को वहशत ने किया सिलसिला-जुम्बाँ पैदा रो के आँखों से निकालूँ में बुख़ार-ए-दिल को कर चुके अब्र-ए-मिज़ा भी कहीं बाराँ पैदा नारा-ज़न कुंज-ए-शहीदाँ में हो बुलबुल की तरह आब-ए-आहन ने किया है ये गुलिस्ताँ पैदा नक़्श उन का न किसी ला'ल से लब पर बैठा मेरे मुँह में हुए थे किस लिए दंदाँ पैदा ख़ौफ़ ना-फ़हमी-ए-मर्दुम से मुझे आता है गाव ख़र होने लगे सूरत-ए-इंसाँ पैदा रूह की तरह से दाख़िल हो जो दीवाना है जिस्म-ए-ख़ाकी समझ इस को जो हो ज़िंदाँ पैदा बे-हिजाबों का मगर शहर है अक़्लीम-ए-अदम देखता हूँ जिसे होता है वो उर्यां पैदा इक गुल ऐसा नहीं होवे न ख़िज़ाँ जिस की बहार कौन से वक़्त हुआ था ये गुलिस्ताँ पैदा मोजिद उस की है सियह-रोज़ी हमारी 'आतिश' हम न होने तो न होती शब-ए-हिज्राँ पैदा — Haidar Ali Aatish
आश्ना गोश से उस गुल के सुख़न है किस का कुछ ज़बाँ से कहे कोई ये दहन है किस का पेशतर हश्र से होती है क़यामत बरपा जो चलन चलते हैं ख़ुश-क़द ये चलन है किस का दस्त-ए-क़ुदरत ने बनाया है तुझे ऐ महबूब ऐसा ढाला हुआ साँचे में बदन है किस का किस तरह तुम से न माँगे तुम्हीं इंसाफ़ करो बोसा लेने का सज़ा-वार दहन है किस का शादी-ए-मर्ग से फूला मैं समाने का नहीं गोर कहते हैं किसे नाम कफ़न है किस का दहन-ए-तंग है मौहूम यक़ीं है किस को कमर-ए-यार है मादूम ये ज़न है किस का मुफ़सिदे जो कि हों उस चश्म-ए-सियह से कम हैं फ़ित्ना-पर्दाज़ी जिसे कहते हैं फ़न है किस का एक आलम को तिरे इश्क़ में सकता होगा साफ़ आईना से शफ़्फ़ाफ़ बदन है किस का हुस्न से दिल तो लगा इश्क़ का बीमार तो हो फिर ये उन्नाब-ए-लब ओ सेब-ए-ज़क़न है किस का गुलशन-ए-हुस्न से बेहतर कोई गुलज़ार नहीं सुम्बुल इस तरह का पुर-पेच-ओ-शिकन है किस का बाग़-ए-आलम का हर इक गुल है ख़ुदा की क़ुदरत बाग़बाँ कौन है इस का ये चमन है किस का ख़ाक में उस को मिलाऊँ उसे बर्बाद करूँँ जान किस की है मिरी जान ये तन है किस का सर्व सा क़द है नहीं मद्द-ए-नज़र का मेरे गुल सा रुख़ किस का है ग़ुंचा सा दहन है किस का क्यूँँ न बे-साख़्ता बंदे हों दिल-ओ-जाँ से निसार क़ुदरत अल्लाह की बे-साख़्ता-पन है किस का आज ही छूटे जो छुटता ये ख़राबा कल हो हम ग़रीबों को है क्या ग़म ये वतन है किस का यार को तुम से मोहब्बत नहीं ऐ 'आतिश' ख़त में अलक़ाब ये फिर मुश्फ़िक़-ए-मन है किस का — Haidar Ali Aatish
दिल बहुत तंग रहा करता है रंग बे-रंग रहा करता है हुस्न में तेरे कोई ऐब नहीं क़ुबह में दंग रहा करता है सुल्ह की दिल से हैं याँ मस्लिहतें वाँ सर-ए-जंग रहा करता है मोहतसिब को तिरे मस्तानों से ख़ौफ़-ए-सरचंग रहा करता है दिल मिरा पी के मोहब्बत की शराब नश्शा में भंग रहा करता है फ़ारसी आर है मुझ मजनूँ को नंग से नंग रहा करता है जौहर-ए-तेग़ दिखाता है हुस्न इश्क़ चौरंग रहा करता है गुफ़्तनी हाल नहीं है अपना कुछ अजब ढंग रहा करता है हलब-ए-रुख़ में तिरे ख़ालों से लश्कर-ए-ज़ंग रहा करता है मंज़िल-ए-गोर के दीवानों के सीना पर संग रहा करता है आलम-ए-वज्द तिरे मस्तों को बे-दफ़-ओ-चंग रहा करता है फ़ुंदुक-ए-दस्त-ए-सनम से नादिम गुल-ए-औरंग रहा करता है तेरे गोश-ए-शुनवा का मुश्ताक़ हर ख़ुश-आहंग रहा करता है बंदिश-ए-चुस्त से तेरी 'आतिश' क़ाफ़िया तंग रहा करता है — Haidar Ali Aatish
चमन में रहने दे कौन आशियाँ नहीं मा'लूम निहाल किस को करे बाग़बाँ नहीं मा'लूम मिरे सनम का किसी को मकाँ नहीं मा'लूम ख़ुदा का नाम सुना है निशाँ नहीं मा'लूम अख़ीर हो गए ग़फ़लत में दिन जवानी के बहार-ए-उम्र हुई कब ख़िज़ाँ नहीं मा'लूम ये इश्तियाक़-ए-शहादत में महव था दम-ए-क़त्ल लगे हैं ज़ख़्म बदन पर कहाँ नहीं मा'लूम सुना जो ज़िक्र-ए-इलाही तो उस सनम ने कहा अयाँ को जानते हैं हम निहाँ नहीं मा'लूम किया है किस ने तरीक़-ए-सुलूक से आगाह मुरीद किस का है पीर-ए-मुग़ाँ नहीं मा'लूम मिरी तरह तो नहीं उस को इश्क़ का आज़ार ये ज़र्द रहती है क्यूँँ ज़ाफ़राँ नहीं मा'लूम जहान ओ कार-ए-जहाँ से हूँ बे-ख़बर मैं मस्त ज़मीं किधर है कहाँ आसमाँ नहीं मा'लूम सुपुर्द किस के मिरे बा'द हो अमानत-ए-इश्क़ उठाए कौन ये बार-ए-गिराँ नहीं मा'लूम ख़मोश ऐसा हुआ हूँ मैं कम-दिमाग़ी से दहन में है कि नहीं है ज़बाँ नहीं मा'लूम मिरी तुम्हारी मोहब्बत है शोहरा-ए-आफ़ाक़ किसे हक़ीक़त-ए-माह-ओ-कताँ नहीं मा'लूम किस आईने में नहीं जल्वा-गर तिरी तिमसाल तुझे समझते हैं हम ईन-ओ-आँ नहीं मा'लूम मिला था ख़िज़्र को किस तरह चश्मा-ए-हैवाँ हमें तो यार का अपने दहाँ नहीं मा'लूम खुली है ख़ाना-ए-सय्याद में हमारी आँख क़फ़स को जानते हैं आशियाँ नहीं मा'लूम तरीक़-ए-इश्क़ में दीवाना-वार फिरता हूँ ख़बर गढ़े की नहीं है कुआँ नहीं मा'लूम जो हो तो शौक़ ही हो कू-ए-यार का हादी किसी को वर्ना सबील-ए-जिनाँ नहीं मा'लूम दहन में आप के अलबत्ता हम को हुज्जत है कमर का भेद जो पूछूँ मियाँ नहीं मा'लूम नसीम-ए-सुब्ह ने कैसा ये उस को भड़काया हनूज़ आतिश-ए-गुल का धुआँ नहीं मा'लूम सुनेंगे वाक़िआ'' उस का ज़बान-ए-सौसन से शहीद किस का है ये अर्ग़वाँ नहीं मा'लूम कनार-ए-आब चले दौर-ए-जाम या लब-ए-किश्त शिकार होवे बत-ए-मय कहाँ नहीं मा'लूम रसाई जिस की नहीं ऐ सनम दर-ए-दिल तक यक़ीं है उस को तिरा आस्ताँ नहीं मा'लूम अजब नहीं है जो अहल-ए-सुख़न हों गोशा-नशीं किसी दहन में ज़बाँ का मकाँ नहीं मा'लूम छुटेंगे ज़ीस्त के फंदे से किस दिन ऐ 'आतिश' जनाज़ा होगा कब अपना रवाँ नहीं मा'लूम — Haidar Ali Aatish
मोहब्बत का तिरी बंदा हर इक को ऐ सनम पाया बराबर गर्दन-ए-शाह-ओ-गदा दोनों को ख़म पाया ब-रंग-ए-शम्अ जिस नय दिल जलाया तेरी दूरी मैं तो उस नय मंज़िल-ए-मक़्सूद को ज़ेर-ए-क़दम पाया बजा करते हैं आशिक़ ताक़-ए-अबरू की परस्तारी यही मेहराब-ए-दैर-ओ-काबा में भी हम ने ख़म पाया निशाना तीर-ए-तोहमत का है मेरा अख़्तर-ए-ताले उठाऊँ दाग़ मैं तो आसमाँ समझे दिरम पाया हज़ारों हसरतें जावेंगी मेरे साथ दुनिया से शरार-ओ-बर्क़ से भी अरसा-ए-हस्ती को कम पाया सिवाए रंज कुछ हासिल नहीं है इस ख़राबे मैं ग़नीमत जान जो आराम तू ने कोई दम पाया नज़र आया तमाशा-ए-जहाँ जब बंद कीं आँखें सफ़ा-ए-क़ल्ब से पहलू में हम ने जाम-ए-जम पाया जलाया और मारा हुस्न की नैरंग-साज़ी ने कभी बर्क़-ए-ग़ज़ब उस को कभी अब्र-ए-करम पाया फ़िराक़-अंजाम काम आग़ाज़-ए-वसलत का बिला शक है बहुत रोया मैं रूह-ओ-तन को जब मुश्ताक़ हम पाया हर इक जौहर में उस का नक़्श-ए-पा-ए-रफ़्तगाँ समझा दम-ए-शमशीर-ए-क़ातिल जादा-ए-राह-ए-अदम पाया हमारा काबा-ए-मक़्सूद तेरा ताक़-ए-अबरू है तिरी चश्म-ए-सियह को हम ने आहु-ए-हरम पाया हुआ हरगिज़ न ख़त्त-ए-शौक़ का सामाँ दुरुस्त 'आतिश' सियाही हो गई नायाब अगर हम ने क़लम पाया — Haidar Ali Aatish
क़ुदरत-ए-हक़ है सबाहत से तमाशा है वो रुख़ ख़ाल-ए-मुश्कीं दिल-ए-फ़िरऔं यद-ए-बैज़ा है वो रुख़ नूर जो उस में है ख़ुर्शीद में वो नूर कहाँ ये अगर हुस्न का चश्मा है तो दरिया है वो रुख़ फूटे वो आँख जो देखे निगह-ए-बद से उसे आईने से दिल-ए-आरिफ़ के मुसफ़्फ़ा है वो रुख़ बज़्म-ए-आलम है तवज्जोह से उसी के आबाद शहर वीराँ है अगर जानिब-ए-सहरा है वो रुख़ सामरी चश्म-ए-फ़ुसूँ-गर की फ़ुसूँ-साज़ी से लब-ए-जाँ-बख़्श के होने से मसीहा है वो रुख़ दम-ए-नज़्ज़ारा लड़े मरते हैं आशिक़ उस पर दौलत-ए-हुस्न के पेश आने से दुनिया है वो रुख़ साया करते हैं हुमा उड़ के परों से अपने तेरे रुख़्सार से दिलचस्प हो अन्क़ा है वो रुख़ गुल ग़लत लाला ग़लत महर ग़लत माह ग़लत कोई सानी नहीं ला-सानी है यकता है वो रुख़ कौन सा उस में तकल्लुफ़ नहीं पाते हर-चंद न मुरस्सा न मोज़हहब न मुतल्ला है वो रुख़ ख़ाल-ए-हिन्दू हैं परस्तिश के लिए आए हैं पुतलियाँ आँखों की दो बुत हैं कलीसा है वो रुख़ कौन सा दिल है जो दीवाना नहीं है उस का ख़त-ए-शब-रंग से सरमाय-ए-सौदा है वो रुख़ उस के दीदार की क्यूँँ-कर न हों आँखें मुश्ताक़ दिल-रुबा शय है अजब सूरत-ए-ज़ेबा है वो रुख़ ता-कुजा शरह करूँँ हुस्न के उस के 'आतिश' महर है माह है जो कुछ है तमाशा है वो रुख़ — Haidar Ali Aatish
दिल-लगी अपनी तिरे ज़िक्र से किस रात न थी सुब्ह तक शाम से या-हू के सिवा बात न थी इल्तिजा तुझ से कब ऐ क़िबला-ए-हाजात न थी तेरी दरगाह में किस रोज़ मुनाजात न थी अब मुलाक़ात हुई है तो मुलाक़ात रहे न मुलाक़ात थी जब तक कि मुलाक़ात न थी ग़ुंचा-ए-गुल को न हँसना था तिरी सूरत से छोटे से मुँह की सज़ा-वार बड़ी बात न थी इब्तिदास तुझे मौजूद समझता था मैं मिरे तेरे कभी पर्दे की मुलाक़ात न थी ऐ नसीम-ए-सहरी बहर-ए-असीरान-ए-क़फ़स तोहफ़ा-तर निकहत-ए-गुल से कोई सौग़ात न थी उन दिनों इश्क़ रुलाता था हमें सूरत-ए-अब्र कौन सी फ़स्ल थी वो जिस में कि बरसात न थी क्या कहूँ उस के जो मुझ पर करम-ए-पिन्हाँ थे ज़ाहिरी यार से हर-चंद मुलाक़ात न थी अपने बाँधे होए गाती तुझे देखा फड़का दिलरुबा शय थी मिरी जान तिरी गात न थी इक में मिल गए ऐ शाह-सवार अहल-ए-नियाज़ नाज़-ए-माशूक़ था तू सुन की तिरे लात न थी लब के बोसे का है इनकार तअज्जुब ऐ यार फेरे साइल से जो मुँह को वो तिरी ज़ात न थी कमर-ए-यार थी अज़-बस-कि निहायत नाज़ुक सूझती बंदिश-ए-मज़मूँ की कोई घात न थी उन दिनों होता था तू घर में हमारे शब-बाश रोज़-ए-रौशन से कम ऐ मेहर-ए-लिक़ा रात न थी बे-शुऊरों ने न समझा तो न समझा 'आतिश' नुक्ता-संजों को लतीफ़ा थी तिरी बात न थी — Haidar Ali Aatish
ख़्वाहाँ तिरे हर रंग में ऐ यार हमीं थे यूसुफ़ था अगर तू तो ख़रीदार हमीं थे बे-दाद की महफ़िल में सज़ा-वार हमीं थे तक़्सीर किसी की हो गुनहगार हमीं थे वा'दा था हमीं से लब-ए-बाम आने का होना साए की तरह से पस-ए-दीवार हमीं थे कंघी तिरी ज़ुल्फ़ों की हमीं पर थी मुक़र्रर आईना दिखाते तुझे हर बार हमीं थे नेमत थी तिरे हुस्न की हिस्से में हमारे तू कान-ए-मलाहत था ख़रीदार हमीं थे सौदा-ज़दा ज़ुल्फ़ों का न था अपने सिवा एक आज़ाद दो-आलम था गिरफ़्तार हमीं थे तू और हम ऐ दोस्त थे यक-जान दो क़ालिब था ग़ैर सिवा अपने जो था यार हमीं थे बीमार-ए-मोहब्बत था सिवा अपने न कोई इक मुस्तहिक़-ए-शर्बत-ए-दीदार हमीं थे बे अपने बहलती थी तबीअत न किसी से दिल-सोज़ हमीं थे तिरे ग़म-ख़्वार हमीं थे इक जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ से ग़श आता था हमीं को दो नर्गिस-ए-बीमार के बीमार हमीं थे जब चाहते थे लेते थे आग़ोश में तुम को मजबूर से रह जाते थे मुख़्तार हमीं थे हम सा न कोई चाहने वाला था तुम्हारा मरते थे हमीं जान से बेज़ार हमीं थे बद-नाम मोहब्बत ने तिरी हम को किया था रुस्वा-ए-सर-ए-कूचा-ओ-बाज़ार हमें थे दिल ठोकरें खाता था न हर गाम किसी का इक ख़ाक में मिलते दम-ए-रफ़्तार हमीं थे भड़काने से 'आतिश' को जलाने लगे या तो अल्ताफ़-ओ-इनायत के सज़ा-वार हमीं थे — Haidar Ali Aatish
ऐ जुनूँ होते हैं सहरा पर उतारे शहर से फ़स्ल-ए-गुल आई कि दीवाने सिधारे शहर से ख़ूब रोए हाल पर अपने वतन का सुन के हाल कोई ग़ुर्बत में जो आ निकला हमारे शहर से जान दूँगा मैं असीर ऐ दोस्तो चुपके रहो ज़िक्र क्या उस का कि दीवाना सुधारे शहर से मौसम-ए-गुल में रहा ज़िंदाँ में और आई न मौत सामने होती नहीं है आँख सारे शहर से जोश-ए-वहशत में जो ली ज़िंदाँ से मैं ने राह-ए-दश्त कूद-काँ मुझ को ख़ुदा-हाफ़िज़ पुकारे शहर से पाँव में मजनूँ के तो ताक़त नहीं ऐ कूदको मौसम-ए-गुल की हुआ तुम को उभारे शहर से इक नज़र लिल्लाह हम को सूरत-ए-ज़ेबा दिखाओ तिश्ना-ए-दीदार जाते हैं तुम्हारे शहर से दश्त-गर्दी की नहीं दीवाने को कुछ एहतियाज जा में से बाहर जो है बाहर है सारे शहर से ऊँट सी लगती है दिल जंगल से होता है उचाट संग-ए-तिफ़्लाँ करते हैं मुझ को इशारे शहर से लाश-ए-वहशत से नहीं पहुँचा मैं सहरा तक हनूज़ जाने वाले गोर के पहुँचे किनारे शहर से मौसम-ए-गुल आई निय्यत सेर दीवानों की हो मेवा-ए-सहराई पर हैं मुँह पसारे शहर से अब तो आज़ुर्दा है तू लेकिन मलेगा हाथ फिर जिस घड़ी 'आतिश' निकल जावेगा प्यारे शहर से — Haidar Ali Aatish
जौहर नहीं हमारे हैं सय्याद पर खुले ले कर क़फ़स को उड़ गए रक्खा जो पर खुले शीशे शराब के रहें आठों पहर खुले ऐसा घिरे कि फिर न कभी अब्र-ए-तर खुले कुछ तो हमें हक़ीक़त-ए-शम्स-ओ-क़मर खुले किस कज-कुलह के इश्क़ में फिरते हैं सर खुले इंसाफ़ को हैं दीदा-ए-अहल-ए-नज़र खुले पर्दा उठा कि पर्दा-ए-शम्स-ओ-क़मर खुले रंगरेज़ की दुकाँ में भरे हूँ हज़ार रंग तुर्रा वो है जो यार की दस्तार पर खुले क्या चीज़ है इबारत-ए-रंगीं में शरह-ए-शौक़ ख़त की तरह तबीअत-ए-बस्ता अगर खुले जो चाहें यार से कहीं अग़्यार ग़म नहीं ख़्वाजा को हैं ग़ुलाम के ऐब-ओ-हुनर खुले हैवाँ पर आदमी को शरफ़ नुत्क़ से हुआ शुक्र-ए-ख़ुदा करे जो ज़बान-ए-बशर खुले यूसुफ़ की इक दुकाँ में न तू ने तलाश की बाज़ार कौन कौन से ऐ बे-ख़बर खुले शीरीं-दहन से तेरे तअज्जुब है गुफ़्तुगू ए'जाज़ है अगर गिरह-ए-नैशकर खुले कट जाए वो ज़बाँ न हो जिस से दुआ-ए-ख़ैर फूटे वो आँख जो कि न वक़्त-ए-सहर खुले कोतह है इस क़दर मिरे क़द पर रिदा-ए-ऐश ढाँकूँ जो पाँव को तो यक़ीं है कि सर खुले क़ातिल जज़ा-ए-ख़ैर मिले तेरी तेग़ को ज़ख़्मों के मुँह खुले नहीं जन्नत के दर खुले फ़स्ल-ए-बहार आई है चलता है दौर-ए-जाम मुग़ की दुकान शाम खुले या सहर खुले पा-पोश हम ने मारी है दस्तार-ओ-ताज पर सौदा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार में रहते हैं सर खुले कैफ़-ए-शराब-ए-नाब का अंजाम हो ब-ख़ैर शलवार-बंद साक़ी-ए-रश्क-ए-क़मर खुले ना-ख़्वांदा शरह-ए-शौक़ जलाए गए ख़ुतूत बाँधे गए वो जो कि मिरे नामा-बर खुले चाहे सफ़ा तू साथ तहारत के ज़िक्र कर परहेज़ कर तो तुझ को दवा का असर खुले हँस कर दिखाए दाँत जो हम को तो क्या हुआ ले लीजिए जो क़ीमत-ए-सिल्क-ए-गुहर खुले कहता हूँ राज़-ए-इश्क़ मगर साथ शर्त के कानों ही तक रहे न ज़बाँ को ख़बर खुले मुश्ताक़ बंदिशों के हैं ख़्वाबों को चाहिए बंधवाएँ शाइरों से जो उन की कमर खुले रुकती न उस से चोट न चलती ये क़ातिला हाथों से तेरे जौहर-ए-तेग़-ओ-सिपर खुले मतलब न सरनविश्त का समझा तू शुक्र कर दीवाना हो जो हाल-ए-क़ज़ा-ओ-क़दर खुले चलना पड़ेगा यार की ख़िदमत में सर के बल समझे हो क्या जो बैठे हो 'आतिश' कमर खुले — Haidar Ali Aatish
दीवानगी ने क्या क्या आलम दिखा दिए हैं परियों ने खिड़कियों के पर्दे उठा दिए हैं अल्लाह-रे फ़रोग़ उस रुख़्सार-ए-आतिशीं का शम्ओं' के रंग मिस्ल-ए-काफ़ूर उड़ा दिए हैं आतिश-नफ़्स हवा है गुलज़ार की हमारे बिजली गिरी है ग़ुंचे जब मुस्कुरा दिए हैं सौ बार गुल को उस ने तलवों तले मला है कटवा के सर्व शमशाद अक्सर जला दिए हैं इंसान-ए-ख़ूब-रू से बाक़ी रहे तफ़ावुत इस वास्ते परी को दो पर लगा दिए हैं अबरू-ए-कज से ख़ून-ए-उश्शाक़ क्या अजब है तलवार ने निशान-ए-लश्कर मिटा दिए हैं किस किस को ख़ूब कहिए अल्लाह ने बुतों को क्या गोश ओ चश्म क्या लब क्या दस्त-ओ-पा दिए हैं बे-यार बाम पर जो वहशत में चढ़ गया हूँ परनाले रोते रोते मैं ने बहा दिए हैं वस्फ़-ए-कमान-ए-अबरू जो कीजिए सो कम है बे-तीर बिस्मिलों के तूदे लगा दिए हैं रोया हूँ याद कर के मैं तेरी तुंद-ख़ूई सरसर ने जब चराग़-ए-रौशन बुझा दिए हैं सोज़-ए-दिल-ओ-जिगर की शिद्दत फिर आज-कल है फिर पहलुओं के तकिए मशअ'ल बना दिए हैं शम्ओं' को तू ने दिल से परवानों के उतारा आँखों से बुलबुलों की गुलशन गिरा दिए हैं वो बादा-कश हूँ मेरी आवाज़-ए-पा को सुन कर शीशों ने सर हुज़ूर-ए-साग़र झुका दिए हैं अश्कों से ख़ाना-ए-तन 'आतिश' ख़राब होगा क़स्र-ए-सीपिहर-ए-रिफ़अत बाराँ ने ढा दिए हैं — Haidar Ali Aatish
कूचा-ए-दिलबर में मैं बुलबुल चमन में मस्त है हर कोई याँ अपने अपने पैरहन में मस्त है नश्शा-ए-दौलत से मुनइम पैरहन में मस्त है मर्द-ए-मुफ़्लिस हालत-ए-रंज-ओ-मेहन में मस्त है दौर-ए-गर्दूं है ख़ुदावंदा कि ये दौर-ए-शराब देखता हूँ जिस को मैं उस अंजुमन में मस्त है आज तक देखा नहीं इन आँखों ने रू-ए-ख़ुमार कौन मुझ सा गुम्बद-ए-चर्ख़-ए-कुहन में मस्त है गर्दिश-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँ गर्दिश-ए-साग़र है याँ ख़ुश रहें अहल-ए-वतन दीवाना-पन में मस्त है है जो हैरान-ए-सफाए-रुख़ हलब में आईना बू-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार से आहू ख़ुतन में मस्त है ग़ाफ़िल ओ होश्यार हैं उस चश्म-ए-मय-गूँ के ख़राब ज़िंदा ज़ेर-ए-पैरहन मुर्दा कफ़न में मस्त है एक साग़र दो जहाँ के ग़म को करना है ग़लत ऐ ख़ुशा-ताले जो शैख़-ओ-बरहमन में मस्त है वहशत-ए-मजनूँ-ओ-'आतिश' में है बस इतना ही फ़र्क़ कोई बन में मस्त है कोई वतन में मस्त है — Haidar Ali Aatish
ग़ैरत-ए-महर रश्क-ए-माह हो तुम ख़ूब-सूरत हो बादशाह हो तुम जिस ने देखा तुम्हें वो मर ही गया हुस्न से तेग़-ए-बे-पनाह हो तुम क्यूँँ-कर आँखें न हम को दिखलाओ कैसे ख़ुश-चश्म ख़ुश-निगाह हो तुम हुस्न में आप के है शान-ए-ख़ुदा इश्क़-बाज़ों के सज्दा-गाह हो तुम हर लिबास आप को है ज़ेबिंदा जामा-ज़ेबों के बादशाह हो तुम फ़ौक़ है सारे ख़ुश-जमालों पर वो सितारे जो हैं तो माह हो तुम हम से पर्दा वही हिजाब का है कूचा-गर्दों से रू-बराह हो तुम क्यूँँ मोहब्बत बढ़ाई थी तुम से हम गुनाहगार बे-गुनाह हो तुम जो कि हक़्क़-ए-वफ़ा बजा लाए शाहिद अल्लाह है गवाह हो तुम है तुम्हारा ख़याल पेश-ए-नज़र जिस तरफ़ जाएँ सद्द-ए-राह हो तुम दोनों बंदे उसी के हैं 'आतिश' ख़्वाह हम उस में होवें ख़्वाह हो तुम — Haidar Ali Aatish
वहशी थे बू-ए-गुल की तरह इस जहाँ में हम निकले तो फिर के आए न अपने मकाँ में हम साकिन हैं जोश-ए-अश्क से आब-ए-रवाँ में हम रहते हैं मिस्ल-ए-मर्दुम-ए-आबी जहाँ में हम शैदा-ए-रू-ए-गुल न तो शैदा-ए-क़द्द-ए-सर्व सय्याद के शिकार हैं इस बोस्ताँ में हम निकली लबों से आह कि गर्दूं निशाना था गोया कि तीर जोड़े हुए थे कमाँ में हम आलूदा-ए-गुनाह है अपना रियाज़ भी शब काटते हैं जाग के मुग़ की दुकाँ में हम हिम्मत पस-अज़-फ़ना सबब-ए-ज़िक्र-ए-ख़ैर है मुर्दों का नाम सुनते हैं हर दास्ताँ में हम साक़ी है यार-ए-माह-लिक़ा है शराब है अब बादशाह-ए-वक़्त हैं अपने मकाँ में हम नैरंग-ए-रोज़गार से ऐमन हैं शक्ल-ए-सर्व रखते हैं एक हाल बहार-ओ-ख़िज़ाँ में हम दुनिया ओ आख़िरत में तलबगार हैं तिरे हासिल तुझे समझते हैं दोनों जहाँ में हम पैदा हुआ है अपने लिए बोरिया-ए-फ़क़्र ये नीस्ताँ है शे'र हैं इस नीस्ताँ में हम ख़्वाहाँ कोई नहीं तो कुछ इस का ओजब नहीं जिंस-ए-गिराँ-बहा हैं फ़लक की दुकाँ में हम लिक्खा है किस के ख़ंजर-ए-मिज़्गाँ का उस ने वस्फ़ इक ज़ख़्म देखते हैं क़लम की ज़बाँ में हम क्या हाल है किसी ने न पूछा हज़ार हैफ़ नालाँ रहे जरस की तरह कारवाँ में हम आया है यार फ़ातिहा पढ़ने को क़ब्र पर बेदार बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता है ख़्वाब-ए-गिराँ में हम शागिर्द तर्ज़-ए-ख़ंदा-ज़नी में है गुल तिरा उस्ताद-ए-अंदलीब हैं सोज़-ओ-फ़ुग़ाँ में हम बाग़-ए-जहाँ को याद करेंगे अदम में क्या कुंज-ए-क़फ़स से तंग रहे आशियाँ में हम अल्लाह-रे बे-क़रारी-ए-दिल हिज्र-ए-यार में गाहे ज़मीं में थे तो गहे आसमाँ में हम दरवाज़ा बंद रखते हैं मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर क़ुफ़्ल-ए-दुरून-ए-ख़ाना हैं अपने मकाँ में हम 'आतिश' सुख़न की क़द्र ज़माने से उठ गई मक़्दूर हो तो क़ुफ़्ल लगा दें ज़बाँ में हम — Haidar Ali Aatish
वो नाज़नीं ये नज़ाकत में कुछ यगाना हुआ जो पहनी फूलों की बध्धी तो दर्द-ए-शाना हुआ शहीद नाज़-ओ-अदा का तिरे ज़माना हुआ उड़ाया मेहंदी ने दिल चोर का बहाना हुआ शब उस के अफ़ई-ए-गेसू का जो फ़साना हुआ हवा कुछ ऐसी बंधी गुल चराग़-ए-ख़ाना हुआ न ज़ुल्फ़-ए-यार का ख़ाका भी कर सका मानी हर एक बाल में क्या क्या न शाख़साना हुआ तवंगरों को मुबारक हो शम-ए-काफ़ूरी क़दम से यार के रौशन ग़रीब-ख़ाना हुआ गुनाहगार हैं मेहराब-ए-तेग़ के साजिद झुकाया सर तो अदा फ़र्ज़-ए-पंज-गाना हुआ ग़ुरूर-ए-इश्क़ ज़ियादा ग़ुरूर-ए-हुस्न से है इधर तो आँख भरी दम उधर रवाना हुआ दिखा दे ज़ाहिद-ए-मग़रूर को भी ऐ सनम आँख जमाल-ए-हूर का हद से सिवा फ़साना हुआ भरा है शीशा-ए-दिल को नई मोहब्बत से ख़ुदा का घर था जहाँ वाँ शराब-ख़ाना हुआ हवाए तुंद न छोड़े मिरे ग़ुबार का साथ ये गर्द-ए-राह कहाँ ख़ाक-ए-आस्ताना हुआ ख़ुदा के वास्ते कर यार चीन-ए-अबरू दूर बड़ा ही ऐब लगा जिस कमाँ में ख़ाना हुआ हुआ जो दिन तो हुआ उस को पास रुस्वाई जो रात आई तो फिर नींद का बहाना हुआ न पूछ हाल मिरा चोब-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ लगा के आग मुझे कारवाँ रवाना हुआ निगाह-ए-नाज़-ए-बुताँ से न चशम-ए-रहम भी रख किसी का यार नहीं फ़ित्ना-ए-ज़माना हुआ असर किया तपिश-ए-दिल ने आख़िर उस को भी रक़ीब से भी मिरा ज़िक्र ग़ाएबाना हुआ हवाए तुंद से पत्ता अगर कोई खड़का समंद-ए-बाद-ए-बहारी का ताज़ियाना हुआ ज़बान-ए-यार ख़मोशी ने मेरी खुलवाई मैं क़ुफ़्ल बन के कलीद-ए-दर-ए-ख़ज़ाना हुआ किया जो यार ने कुछ शग़्ल-ए-बर्क़-अंदाज़ी चराग़-ए-ज़िंदगी-ए-ख़िज़र तक निशाना हुआ रहा है चाह-ए-ज़क़न में मिरा दिल-ए-वहशी कुएँ में जंगली कबूतर का आशियाना हुआ ख़ुदा दराज़ करे उम्र-ए-चर्ख़-ए-नीली को ये बे-कसों के मज़ारों का शामियाना हुआ नहीं है मिस्ल-ए-सदफ़ मुझ सा दूसरा कम-बख़्त नसीब-ए-ग़ैर मिरे मुँह का आब-ओ-दाना हुआ हिनाई हाथों से चोटी को खोलता है यार कहाँ से पंजा-ए-मरजाँ हरीफ़-ए-शाना हुआ दिखाई चश्म-ए-ग़ज़ालाँ ने हल्क़ा-ए-ज़ंजीर हमें तो गोशा-ए-सहरा भी क़ैद-ख़ाना हुआ हमेशा शाम से हम-साए मर रहे 'आतिश' हमारा नाला-ए-दिल गोश को फ़साना हुआ — Haidar Ali Aatish