ai junoon hote hain sehra par utaare shahar se | ऐ जुनूँ होते हैं सहरा पर उतारे शहरस

  - Haidar Ali Aatish

ऐ जुनूँ होते हैं सहरा पर उतारे शहरस
फ़स्ल-ए-गुल आई कि दीवाने सिधारे शहरस

ख़ूब रोए हाल पर अपने वतन का सुन के हाल
कोई ग़ुर्बत में जो आ निकला हमारे शहरस

जान दूँगा मैं असीर ऐ दोस्तो चुपके रहो
ज़िक्र क्या उस का कि दीवाना सुधारे शहरस

मौसम-ए-गुल में रहा ज़िंदाँ में और आई न मौत
सामने होती नहीं है आँख सारे शहरस

जोश-ए-वहशत में जो ली ज़िंदाँ से मैं ने राह-ए-दश्त
कूद-काँ मुझ को ख़ुदा-हाफ़िज़ पुकारे शहरस

पाँव में मजनूँ के तो ताक़त नहीं ऐ कूदको
मौसम-ए-गुल की हुआ तुम को उभारे शहरस

इक नज़र लिल्लाह हम को सूरत-ए-ज़ेबा दिखाओ
तिश्ना-ए-दीदार जाते हैं तुम्हारे शहरस

दश्त-गर्दी की नहीं दीवाने को कुछ एहतियाज
जा
में से बाहर जो है बाहर है सारे शहरस

ऊँट सी लगती है दिल जंगल से होता है उचाट
संग-ए-तिफ़्लाँ करते हैं मुझ को इशारे शहरस

लाश-ए-वहशत से नहीं पहुँचा मैं सहरा तक हनूज़
जाने वाले गोर के पहुँचे किनारे शहरस

मौसम-ए-गुल आई निय्यत सेर दीवानों की हो
मेवा-ए-सहराई पर हैं मुँह पसारे शहरस

अब तो आज़ुर्दा है तू लेकिन मलेगा हाथ फिर
जिस घड़ी 'आतिश' निकल जावेगा प्यारे शहरस

  - Haidar Ali Aatish

Muflisi Shayari

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