ऐ जुनूँ होते हैं सहरा पर उतारे शहरस
फ़स्ल-ए-गुल आई कि दीवाने सिधारे शहरस
ख़ूब रोए हाल पर अपने वतन का सुन के हाल
कोई ग़ुर्बत में जो आ निकला हमारे शहरस
जान दूँगा मैं असीर ऐ दोस्तो चुपके रहो
ज़िक्र क्या उस का कि दीवाना सुधारे शहरस
मौसम-ए-गुल में रहा ज़िंदाँ में और आई न मौत
सामने होती नहीं है आँख सारे शहरस
जोश-ए-वहशत में जो ली ज़िंदाँ से मैं ने राह-ए-दश्त
कूद-काँ मुझ को ख़ुदा-हाफ़िज़ पुकारे शहरस
पाँव में मजनूँ के तो ताक़त नहीं ऐ कूदको
मौसम-ए-गुल की हुआ तुम को उभारे शहरस
इक नज़र लिल्लाह हम को सूरत-ए-ज़ेबा दिखाओ
तिश्ना-ए-दीदार जाते हैं तुम्हारे शहरस
दश्त-गर्दी की नहीं दीवाने को कुछ एहतियाज
जा
में से बाहर जो है बाहर है सारे शहरस
ऊँट सी लगती है दिल जंगल से होता है उचाट
संग-ए-तिफ़्लाँ करते हैं मुझ को इशारे शहरस
लाश-ए-वहशत से नहीं पहुँचा मैं सहरा तक हनूज़
जाने वाले गोर के पहुँचे किनारे शहरस
मौसम-ए-गुल आई निय्यत सेर दीवानों की हो
मेवा-ए-सहराई पर हैं मुँह पसारे शहरस
अब तो आज़ुर्दा है तू लेकिन मलेगा हाथ फिर
जिस घड़ी 'आतिश' निकल जावेगा प्यारे शहरस
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Haidar Ali Aatish
our suggestion based on Haidar Ali Aatish
As you were reading Muflisi Shayari Shayari