ALI ZUHRI

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ALI ZUHRI shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in ALI ZUHRI's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

नज़र घुमा के कभी देख ले घड़ी की तरफ़ बहुत समय से कोई तेरे इंतिज़ार में है — ALI ZUHRI
कुछ इस तरह तेरी यादों में डूबता है दिल वो जैसे शाम को मग़रिब में डूबता है शम्स — ALI ZUHRI
तुम्हारी मौत का दुख होता तो सहन होता तुम्हारे हिज्र का दुख कैसे सह सकूँगा मैं — ALI ZUHRI
मेरी तमाम ज़िंदगी बर्बाद कर के अब मसरूफ़ होगी ईद कि तय्यारियों में वो — ALI ZUHRI
कोई सोचे मोहब्बत को तो क्या सोचे किसी वीराने में जलता दिया सोचे — ALI ZUHRI
देख कर हुस्न तिरा चाँद बहक जाता है लड़खड़ाता हुआ अंबर से ढलक जाता है — ALI ZUHRI
उसे बनाया गया था बहुत हसीन जमील मैं उस सेे इश्क़ न करता तो और क्या करता — ALI ZUHRI
मोहब्बत आबगीनों में हसीनों नाज़नीनों में बड़ी वहशत सी होती है दिलों के इन मकीनों में — ALI ZUHRI

Ghazal

मैं उस के इश्क़ में अब क्या से क्या नहीं हो रहा मगर वो शख़्स तो फिर भी मेरा नहीं हो रहा वो कर रहा है मुझे अपनी बंदिशों से रिहा ये और बात है मैं ख़ुद रिहा नहीं हो रहा उसे जुदा हुए बरसों गुज़र गए लेकिन ग़म-ए-फ़िराक़ का मौसम जुदा नहीं हो रहा उदासियों की नज़र ने सुखा दिया होगा ये इक शजर जो फिज़ा से हरा नहीं हो रहा मुझे तो चाहिए सूरज-मुखी के जैसा शख़्स अब इन गुलाबों से मेरा भला नहीं हो रहा मुझे पता तो है वो बे-वफ़ाई कर रहा है ये मेरा ज़र्फ़ है उस सेे ख़फ़ा नहीं हो रहा मैं तेरे साथ में रह कर भी ख़ुश नहीं तो फिर मेरी जाँ मुझ सेे तेरा हक़ अदा नहीं हो रहा कभी जिन्हें था बहुत नाज़ ख़ुद के होने का अब उन के बा'द ज़माने में क्या नहीं हो रहा ये सोचते थे कि सब सामने कहेंगे उसे अभी मिले हैं तो अर्ज़-ए-गिला नहीं हो रहा — ALI ZUHRI
मैं तो एहसास हूँ तेरा मैं किधर जाऊँगा तेरे हिस्से का तेरे पास ठहर जाऊँगा मैं के दीवाना हूँ पागल भी हूँ आवारा भी शब-ए-अफ़्सुर्दा में काजल सा बिखर जाऊँगा ज़िंदगी तेरी तमन्न्ना का सफ़र समझा है तू जहाँ से भी कहेगी मैं गुज़र जाऊँगा मैं ने सोचा था तेरे दिल में उतर जाने का कब ये सोचा था कि दिल से ही उतर जाऊँगा अपने पहलू में पड़ा रहने दे आज़ाद न कर तेरे पहलू में रहूँगा तो सँवर जाऊँगा वैसे तो इश्क़ दुबारा से नहीं करना मुझे हाँ अगर करना हुआ तुझ सेे ही कर जाऊँगा तुम ने मुझ को जो ये शीशे का बना डाला है देखना टूट के हाथों में बिखर जाऊँगा — ALI ZUHRI
उसे ये कहना भले ही कभी न आए वो पर अपने होने की कोई ख़बर तो लाए वो वो जो हसीन है दिलकश है ख़ूब-सूरत है अदा से अपनी किसी और को लुभाए वो सुना है मैं ने वो हिंदा मिज़ाज लड़की है तो पेश है मेरा दिल शौक़ से चबाए वो भटक गया हूँ कहीं इश्क़ के सफ़र में मैं अब आए और मुझे रास्ता दिखाए वो मेरी तरह से जो ता उम्र उस को तंग करे मेरी दुआ है के मुझ जैसा बेटा पाए वो ख़ुदा के फज़्ल से उस की मुराद पूरी हुई मेरी तबाही पे ख़ुशियों के गीत गाए वो जिसे भी लगता है मेरे बयान में है नुक़्स तो मेरे पास से उठ कर चला भी जाए वो ख़ुदा करे उसे उस की ख़ताओं से आगाह ख़ुद अपने आप को ही आइना दिखाए वो — ALI ZUHRI
तेरे ख़यालों के जंगल को फिर सजाऊँगा दुबारा इश्क़ में क़िस्मत को आज़माऊँगा दिखा चुका हूँ इन्हें तेरे हुस्न की रंगत अब इस से अच्छा इन आँखों को क्या दिखाऊँगा हथेलियों की लकीरें बनाऊँगा बेहतर मगर जबीं को शिकन से नहीं सजाऊँगा ख़ुदा ने गर कभी बनवाया मुझ सेे आदमी को तो उस के सीने में मैं दिल नहीं बनाऊँगा मुझे भी देखनी है इंतिज़ार की आँखें पलट के आया भी तो देर से ही आऊँगा तमाम दुनिया मनाए मोहब्बतों के दिन मैं हिज्र-ज़ाद हूँ बस हिज्र ही मनाऊँगा जो रोज़ एक ही चेहरा उदास दिखता है मैं घर में रक्खे सभी आईने हटाऊँगा बिछड़ते वक़्त यही दुख सता रहा था मुझे मैं तेरे क़ुर्ब के मौसम कहाँ से लाऊँगा महीनों बा'द मुझे उस सेे मिलने जाना है महीनों बा'द ही अब बाल भी बनाऊँगा मुझे भुला के वो आगे निकल चुका है और मैं सोच में हूँ कि कैसे उसे भुलाऊँगा मुझे दिया भी है रब ने सुख़न-वरी का हुनर ब-रोज़-ए-हश्र मैं रब को ग़ज़ल सुनाऊँगा — ALI ZUHRI
शाम होते ही पलट कर उसे घर जाना था मैं था आवारा मुझे जाने किधर जाना था बड़ा नुक़सान हुआ इश्क़ की जुर्रत कर के इस सेे अच्छा था मुझे इश्क़ से डर जाना था मैं ने क्यूँँ इश्क़ की गलियों में किया शोर बपा मुझ को चुप-चाप दबे पाँव गुज़र जाना था मैं शजर था वो परिंदा सो उसे भी किसी दिन छोड़ कर मुझ को किसी और शजर जाना था अपना रिश्ता भी किसी रेत महल जैसा था धीरे धीरे ही सही उस को बिखर जाना था आज वो ख़ुश है किसी अजनबी की बाँहों में वो जिसे मुझ सेे बिछड़ कर कभी मर जाना था जी बहुत था कि तेरे पास ठहर जाऊँ पर मैं मुसाफ़िर था मुझे अपने नगर जाना था जितना रोया हूँ मैं रातों को जुदाई में तेरी ख़ाली दरिया भी अगर होता तो भर जाना था — ALI ZUHRI
बिछड़ के हम सेे न जाने किधर गया होगा वो रेत बनके कहीं पर बिखर गया होगा वो चाँद पे जो नज़र आती है ख़ूँ की लाली किसी का इश्क़ हदों से गुज़र गया होगा लगा के आग सभी हुस्न-आफ़रीनों को तुम्हारे शहर का मौसम सुधर गया होगा जगह जगह जो मोहब्बत का राग गाता था वो शख़्स वक़्त से पहले ही मर गया होगा जिसे कभी जाँ से ज़्यादा अज़ीज़ लगते थे हम अब उस के दिल में कोई और उतर गया होगा निशाँ जो इश्क़ का गर्दन पे छोड़ता था वो बदन को चूमने से क्या निखर गया होगा हमीं थे जो चले जाते थे उन के कूचे में हमारे बा'द न कोई उधर गया होगा कुछ इस लिए भी हाँ मजनूँ को मारे थे पत्थर ज़माना इश्क़ की जुर्रत से डर गया होगा मेरे सिवा किसी को चाहती रही हो तुम ये दिल जवानी में नादानी कर गया होगा — ALI ZUHRI

Nazm

"निसा" दुनिया के रंगीन मज़ाहिरों से हट कर,जब कभी मेरी नज़र उस सादा लिबास लड़की पे अगर पड़ती, मेरे दिल से हसरतें निकलती और उमंगें झूम उठती, उस लड़की के नाक-नक़्श बिल्कुल भी बनावटी नहीं उस के बदन के नुक़ूश में कुछ भी सजावटी नहीं, ख़ुदा की क़सम दुनिया के मज़ाहिरों में उस के सिवा कुछ भी देखने को नहीं, उसे इस दुनिया की रंगीनियों की कोई परवाह ही नहीं, मानो दुनिया से उसे कोई राब्ता ही नहीं, उसे ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत की निशानी के लिए बनाया होगा उस का पैकर तहतुस्सरा की मिट्टी से तराशा होगा उस की बुलंदी पे फ़रिश्तों ने भी सर झुकाया होगा वो तो ऐसी चीज़ है जिसे देख कर ख़ुदा को ख़ुद अपनी कुन पे रश्क आया होगा, ख़ुदा ने, कोयल को उस की समा'अत के आशार बख़्शें हैं और पेड़ों को उस की बाँहों के हार बख़्शें हैं ये घटा उस की ज़ुल्फ़ों की छाँव में रह कर काली होती है उस के आँचल से ही शाम पर लाली होती है उस के हाथों की लकीरों पर दुनिया नक़्श है जन्नत की हूरों में भी उस का ही अक्स है उस की आँखों की बीनाई से सुब्ह,रात रौशन है उस के पहलू में सातों बर्र-ए-आज़मों के मौसम हैं उस के आरिज़ की पुरनमीं से गुलाब महकते हैं उस की मुस्कुराहट से जंगल के पंछी चहकते हैं जुगनू ने उस की ज़ीनत पाई है मेहँदी ने भी उस के हाथों पे रंगत पाई है मैं उस लड़की की वज़ाहत अपनी नज़्मों में करुँ भी तो कैसे करुँ कि मैं ने उसे देखा ही बहुत कम है, वो रब का अहसान है या तुक़ज़्ज़िबान इस पे क्या झगड़ना की वो नास है या निसा वो तो ज़िंदगी को ज़रूरी है जैसे कि निज़ाम-ए-फिज़ा — ALI ZUHRI
'सिगरेट और मोहब्बत' वो मुझ सेे रोज़ कहती थी ये सिगरेट छोड़ दो ना तुम हमेशा ग़म में रहने कि रिवायत तोड़ दो ना तुम तो मैं हँसकर ये कहता था बड़ी नादान हो पागल कि मेरी ज़ात से तुम भी अभी अंजान हो पागल चलो माना ये आदत है इसे मैं छोड़ सकता हूँ मोहब्बत भी तो आदत है उसे भी छोड़ दूँ क्या मैं मोहब्बत का जो जज़्बा है बहुत वो ख़ास है शायद मुझे हर वक़्त लगता है वो मेरे पास है शायद मोहब्बत रोग ही तो है ये कोई जोग ही तो है जो हर दम ये उदासी है किसी का सोग ही तो है मोहब्बत की रिवायत है ये ग़म पाना इबादत है मैं अपने ज़ख़्म सीता हूँ ग़म ए माज़ी को जीता हूँ ये सिगरेट और ग़म जो हैं ये ज़रिए राब्ते के हैं धुएँ में अक्स है उस का ग़मों में रम्ज़ है उस का उसे जब याद करने में बहुत दुश्वारी होती है तो मैं सिगरेट को पीता हूँ उसे हर साँस जीता हूँ तो अब तुम ही कहो जानाँ मोहब्बत छोड़ दूँ कैसे जो मेरे ग़म की साथी है वो सिगरेट तोड़ दूँ कैसे। — ALI ZUHRI
"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा — ALI ZUHRI
"गिला" मुझे याद कर या मुझे भूल जा मुझे तुझ सेे इस का गिला नहीं तू मिला नहीं तो फिर क्या हुआ मुझे ख़ुद को मैं भी मिला नहीं मेरी वहशतों में ख़याल है मेरा इश्क़ इश्क़-ए-मलाल है मेरी जान तेरा जो हिज्र है ख़ुदा क़सम ये बवाल है मुझे दुख है के तू क़रीब था फिर क़रीब क्यूँँ तू रहा नहीं मैं ने माना मैं ही ख़राब था मेरी रूह पे तारी अज़ाब था मेरे वास्ते जो तेरे दिल में था तू ने क्यूँँ वो मुझ सेे कहा नहीं तुझे मुझ सेे गर ज़रा भी प्यार था तू ने क्यूँँ फिर मुझ को सहा नहीं कभी लौट आ कोई बात कर जो गुज़र गया उसे याद कर मेरे हाल का कर तब्सिरा मेरे ग़म पे आ कर मलाल कर मैं बताऊँ तू ने था क्या किया तू ने मेरे दिल को ज़िबाह किया तू ने मेरी दुनिया उजाड़ कर तू ने दिल किसी से लगा लिया ये जो अहद ए तर्क-ए-वफा किया तू ने इश्क़ में ये गुनाह किया तू ने मुझ को को ख़ाक बना दिया तू ने सब हवा में उड़ा दिया तू ने कैसे मुझ को भुला दिया मैं तो तुझ को अब तक भूला नहीं तू मेरा नहीं कुछ गिला नहीं ये बता दे क्या मैं तेरा नहीं — ALI ZUHRI
नज़्म- मोहब्बत क्या है मोहब्बत क्या है शायद बदन को पाने का कोई बहाना है मोहब्बत शाइरों के झूठे क़िस्सों का ठिकाना है मोहब्बत में बदन पाना ज़रूरी भी नहीं होता मोहब्बत तो बदन की हद से परे है और हवस की क्यारी में उगता हुआ इक फूल होती है इसे महबूब-ए-जाँ से कोई मतलब नहीं होता मोहब्बत तो ख़ुद ही महबूब होती है मोहब्बत तो फ़क़त एहसास-ए-क़ुर्ब होती है ये वो आग है जो तन्हा सीनों में दबी होती है मोहब्बत दिल मकीनों में किसी एहसास की तरह बसी होती है मोहब्बत ख़्वाबों से आँखों में उतर आती है मोहब्बत सीनों में अजब इल्हाम लाती है मोहब्बत तो तसव्वुर है जो ज़ेहनों पे गुमाँ लाती है मोहब्बत लफ़्ज़ बन के ग़ज़लों में उभर जाती है मोहब्बत ख़ूँ कब माँगती है मोहब्बत तो सुकूँ चाहती है मोहब्बत जुनूँ भी नहीं है कोई मोहब्बत अंदाज़-ए-फ़ुसूँ चाहती है मोहब्बत आग है मोहब्बत राग है मोहब्बत अँधेरा जंगल है मोहब्बत सहराओं का संदल है मोहब्बत गहरे पानी में गोते लगाती मछलियों का मगर है मोहब्बत जलती बुझती शमाओं पे परवानों का बसर है मोहब्बत झरनों से बहता पानी है जो क़ाबू नहीं पा सकता मोहब्बत वो जंगल है जहाँ इंसान अपनी मंज़िल नहीं ला सकता मोहब्बत क़ब्रों पे उगती हरी पत्तियाँ हैं मोहब्बत वीराने में जलती मोमबत्तियाँ हैं मोहब्बत देने दिलाने के रिवाजों से जुदा है मोहब्बत के क़लंदरों को मोहब्बत ही ख़ुदा है मोहब्बत अफ़साना-ए-दहर है मोहब्बत ख़ुदाओं का क़हर है मोहब्बत नागिनों का ज़हर है मोहब्बत तो बस बे-बहर है मोहब्बत वीरान जंगलों का दुख है मोहब्बत कुँवारी लड़कियों का दुख है मोहब्बत परिंदों का दुख है ये मय-ख़ाने के रिंदो का दुख है मोहब्बत तन्हा सफ़र है मुसाफ़िर की रह-गुज़र है कोई सोचे मोहब्बत को तो क्या सोचे किसी वीराने में जलता दिया सोचे मोहब्बत तो किसी का भी वजूद-ए-जाँ नहीं देखे यहाँ बंदा ख़ुदा का क्या ख़ुदी का भी नहीं सोचे — ALI ZUHRI
"क्या लगती हो" मैं जब कोई नज़्म कहता हूँ तुम उस का उनवान लगती हो मुझ सेे मिरी बातें करती हो कौन हो तुम मेरी क्या लगती हो कितनी कम मुयस्सर हो तुम मुझ को फिर भी सारी की सारी लगती हो तुम्हें तितलियाँ तलाश करती हैं बारिशों में भीगा गुलाब लगती हो सितारे तुम्हारा तवाफ़ करते हैं फ़लक पर चमकता चाँद लगती हो आँखें ग़ज़ल हिरणी ज़ुल्फ़ घटा सावन पहाड़ी पर रक़्स करता बादल लगती हो हर एक बात वली सी करती हो जैसे किसी मज़ार की दुआ लगती हो ये हुस्न-ए-आतिश दहकता शबाब कितने ही कोह-ए-तूर जलाती हो तुम्हें ख़ामोशियाँ इस तरह पुकारती हैं जैसे गाँव में मग़रिब की अज़ान लगती हो अब क्या ज़ेहमत करें ये कहने में फ़लक से उतरा हुआ फरिश्ता लगती हो — ALI ZUHRI