तुझ सेे भी गर जुदा रहूँगा मैं
दोस्त ख़ुद से ख़फ़ा रहूँगा मैं
ऐसे ही ख़ुश-मिज़ाज रहना तुम
ऐसे ही ग़म-ज़दा रहूँगा मैं
सब परिंदे हैं छोड़ जाएँगे
मैं शजर हूँ खड़ा रहूँगा मैं
हो चुका आप की रज़ा का खेल
अब से अपना ख़ुदा रहूँगा मैं
एक लड़की का दिल दुखा के क्या
उस की महव-ए-दुआ रहूँगा मैं
— ALI ZUHRI















