"बाबा"

तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा
वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा

तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी
वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा

ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है
ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा

तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था
हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा

तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें
तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा

तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है
भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा

तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया
वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा

दिल से अब बस यही दुआ निकलती है
हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा

— ALI ZUHRI

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Udasi Shayari

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