"क्या लगती हो"

मैं जब कोई नज़्म कहता हूँ
तुम उस का उनवान लगती हो
मुझ से मिरी बातें करती हो
कौन हो तुम मेरी क्या लगती हो
कितनी कम मुयस्सर हो तुम मुझ को
फिर भी सारी की सारी लगती हो
तुम्हें तितलियाँ तलाश करती हैं
बारिशों में भीगा गुलाब लगती हो
सितारे तुम्हारा तवाफ़ करते हैं
फ़लक पर चमकता चाँद लगती हो
आँखें ग़ज़ल हिरणी ज़ुल्फ़ घटा सावन
पहाड़ी पर रक़्स करता बादल लगती हो
हर एक बात वली सी करती हो
जैसे किसी मज़ार की दुआ लगती हो
ये हुस्न-ए-आतिश दहकता शबाब
कितने ही कोह-ए-तूर जलाती हो
तुम्हें ख़ामोशियाँ इस तरह पुकारती हैं
जैसे गाँव में मग़रिब की अज़ान लगती हो
अब क्या ज़ेहमत करें ये कहने में
फ़लक से उतरा हुआ फरिश्ता लगती हो

— ALI ZUHRI

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