जब भी माज़ी के मेरे दर्द छलक आते हैं
कोरे काग़ज़ पे नए लफ्ज़ उतर जाते हैं
अब उदासी में गुज़र जाती हैं शा
में अपनी
तारे तकते हुए ख़्वाबों को निकल जाते हैं
जब सताते हैं ये तन्हाई भरे लम्हें हमें
साथ जीने को नया दर्द पकड़ लाते हैं
मेरे छू लेने पे बढ़ जाती थी साँसें जिनकी
कैसे बाँहों में वो ग़ैरों की सिमट जाते हैं
जब भी सुलगाता हूँ सिगरेट तेरी यादों में
सब धुएँ बन के तेरे नक़्श उभर आते हैं
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