ज़िंदगी को ख़राब कर रहा हूँ
दिल पे तारी अज़ाब कर रहा हूँ
एक लड़की को सोच सोच के मैं
दिल को मिस्ल-ए-गुलाब कर रहा हूँ
आदतें लग गईं हैं मयकशी की
पानी को भी शराब कर रहा हूँ
हालत-ए-दिल गुज़ार कर ख़ुद पे
बीते माज़ी को ख़्वाब कर रहा हूँ
और दुनिया में खो चुका हूँ मैं
रम्ज़-ए-पर्दा हिजाब कर रहा हूँ
मेरे ग़म मेरे हैं मैं ही जानूँ
ख़त्म सब से हिसाब कर रहा हूँ
— ALI ZUHRI















