Gulzar Dehlvi

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Gulzar Dehlvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Gulzar Dehlvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मीर के बा'द ग़ालिब ओ इक़बाल इक सदा, इक सदी में गुज़री है — Gulzar Dehlvi
जहाँ इंसानियत वहशत के हाथों ज़ब्ह होती हो जहाँ तज़लील है जीना वहाँ बेहतर है मर जाना — Gulzar Dehlvi
हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा वाक़िए हो गए कहानी से — Gulzar Dehlvi
उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है बस वही आगही में गुज़री है — Gulzar Dehlvi

Ghazal

दिल ही दिल में दर्द के ऐसे इशारे हो गए ग़म ज़माने के शरीक-ए-ग़म हमारे हो गए जो अभी महफ़ूज़ हैं तन्क़ीद है उन का शिआ'र हाल उन का पूछिए जो बे-सहारे हो गए बिन खिले मुरझा गईं कलियाँ चमन में किस क़दर ज़र्द-रू किस दर्जा हाए माह-पारे हो गए अम्न की ताक़त को कुचला सच को रुस्वा कर दिया दुश्मनों के चार-दिन में वारे-न्यारे हो गए ये ज़माना किस क़दर बार-ए-गराँ साबित हुआ अपने बेगाने हुए बेगाने प्यारे हो गए दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-सुकूँ एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे हो गए डूबने वालों से ज़ाइद खा रहा है उन का ग़म जिन को साहिल तेग़-ए-उर्यां के किनारे हो गए अश्क-ए-ग़म में नूर-ए-रहमत इस तरह शामिल रहा चाँद-तारों से सिवा ये चाँद-तारे हो गए हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में छा गई ग़म की घटा जो शगूफ़े थे चमन में वो शरारे हो गए — Gulzar Dehlvi
या मिला क़ौम को ख़ुद अपना निगहबाँ हो कर सौ तरह देख लिया हम ने परेशाँ हो कर काफ़िर-ए-इश्क़ ही अच्छे थे सनम-ख़ानों में शान-ए-ईमाँ न मिली साहब-ए-ईमाँ हो कर नक़्स-ए-तंज़ीम से हो तर्क-ए-चमन क्या मा'नी हम को रहना है यहीं तार-ए-रग-ए-जाँ हो कर क्या हुआ गर कोई हिन्दू कि मुसलमाँ ठहरा आदमियत का नहीं पास जो इंसाँ हो कर हम बुझें भी तो बुझें मिस्ल-ए-चराग़-ए-सहरी और जो रौशन हों तो हों शम-ए-शबिस्ताँ हो कर दिल में अहबाब के हम बन के असर बैठेंगे और उठेंगे इसी गुलशन से बहाराँ हो कर क्या गुलिस्ताँ में नया हुक्म-ए-ज़बाँ-बंदी है बाग़बाँ भी हुआ सय्याद-ए-निगहबाँ हो कर सिद्क़ निय्यत से अगर उस की चमन-बंदी हो फिर रहे क्यूँँ न वतन मुल्क-ए-सुलैमाँ हो कर अब हम अपने लिए ख़ुद सूद-ओ-ज़ियाँ सोचेंगे हम को जीना ही नहीं बंदा-ए-एहसाँ हो कर रश्क-ए-गुलज़ार-ए-इरम अर्ज़-ए-वतन जब होगी अपने बेगाने बसें सुम्बुल-ओ-रैहाँ हो कर — Gulzar Dehlvi
न सही हम पे इनायत नहीं पैमानों की खिड़कियाँ खुल गईं आँखों से तो मय-ख़ानों की आ नहीं सकता समझ में कभी फ़र्ज़ानों की सुर्ख़-रू कैसे जबीनें हुईं दीवानों की ज़ुल्फ़ बिखराए सर-ए-शाम परेशान हैं वो क़िस्मतें औज पे हैं चाक-गरेबानों की दास्ताँ कोहकन-ओ-क़ैस की फ़र्सूदा हुई सुर्ख़ियाँ हम ने बदल डाली हैं अफ़्सानों की आँखें तो भीग चुकीं और न प्यार आ जाए और रूदाद सुनें आप न दीवानों की मय-कदे आने से पहले का ज़माना तौबा ख़ाक छानी है हरम और सनम-ख़ानों की ज़ख़्म-ए-दिल को कोई मरहम भी न रास आएगा हर गुल-ए-ज़ख़्म में लज़्ज़त है नमक-दानों की जाने कब निकले मुरादों की दुल्हन की डोली दिल में बारात है ठहरी हुई अरमानों की ज़ख़्म पर हँसते हैं अश्कों को गुहर कहते हैं अक़्ल मारी गई इस दौर में इंसानों की कितने मोमिन नज़र आते हैं सनम-ख़ानों में एक काफ़िर नहीं बस्ती में मुसलमानों की जितनी तज़हीक तिरे शहर में अपनों की हुई उतनी तौहीन न होगी कहीं बेगानों की रात बढ़ बढ़ के जो शम्अ' पे हुए थे सदक़े सुब्ह तक ख़ाक न देखी गई परवानों की हरम-ओ-दैर की बस्ती में है तमईज़-ओ-नफ़ाक़ कोई तफ़रीक़-ए-मिलल देखी न दीवानों की लोग क्यूँँ शहर-ए-ख़मोशाँ को खिंचे जाते हैं जाने क्या जान है इस बस्ती में बे-जानों की रुख़ बदलते हैं दोराहे पे खड़े हैं सालार सई-ए-नाकाम तो देखे कोई नादानों की हाथा-छाँटी है अजब और अजब लूट-खसूट निय्यतें और हैं शायद कि निगहबानों की पूछे 'गुलज़ार' से है वो ब-ज़बान-ए-सौसन तुम कहाँ बज़्म में आए हो ज़बाँ-दानों की — Gulzar Dehlvi
अब तो सहरा में रहेंगे चल के दीवानों के साथ दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ ख़त्म हो जाएँगे क़िस्से कल ये दीवानों के साथ फिर इन्हें दोहराओगे तुम कितने उनवानों के साथ बज़्म में हम को बुला कर आप उठ कर चल दिए क्या सुलूक-ए-नारवा जाएज़ है मेहमानों के साथ नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ उन की आँखों की गुलाबी से जो हम मख़मूर हैं इक तअ'ल्लुक़ है क़दीमी हम को पैमानों के साथ हर तरफ़ कू-ए-बुताँ में हसरतों का है हुजूम एक दिल लाए थे हम तो अपना अरमानों के साथ कल तलक दानाओं की सोहबत में थे सब के इमाम आज कैसे सुस्त हैं यूँँ शैख़ नादानों के साथ उन की आँखें इक तरफ़ ये जाम-ओ-मीना इक तरफ़ किस तरह गर्दिश में हैं पैमाने पैमानों के साथ आशिक़ों के दिल में शब फ़ानूस रौशन हो गए शम्अ' का जीना है लाज़िम अपने परवानों के साथ हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल यगाने हो गए लहलहा कर अब रहेगा सब्ज़ा बेगानों के साथ — Gulzar Dehlvi
हम जो गुज़रे उन की महफ़िल के क़रीब इक कसक सी रह गई दल के क़रीब सब के सब बैठे थे क़ातिल के क़रीब बे-कसी थी सिर्फ़ बिस्मिल के क़रीब ज़िंदगी क्या थी अजब तूफ़ान थी अब कहीं पहुँचे हैं मंज़िल के क़रीब इस क़दर ख़ुद-रफ़्ता-ए-सहरा हुए भूल कर देखा न महमिल के क़रीब हाए उस मुख़्तार की मजबूरियाँ जिस ने दम तोड़ा हो मंज़िल के क़रीब ज़िंदगी-ओ-मौत वाहिद आइना आदमी है हद्द-ए-फ़ासिल के क़रीब ये तजाहुल आरिफ़ाना है जनाब भूल कर जाना न ग़ाफ़िल के क़रीब तर्बियत को हुस्न-ए-सोहबत चाहिए बैठिए उस्ताद-ए-कामिल के क़रीब होश की कहता है दीवाना सदा और मायूसी है आक़िल के क़रीब देखिए उन बद-नसीबों का मआल वो जो डूबे आ के साहिल के क़रीब छाई है 'गुलज़ार' में फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ फूल हैं सब गुल शमाइल के क़रीब — Gulzar Dehlvi
ज़िंदगी राह-ए-वफ़ा में जो मिटा देते हैं नक़्श उल्फ़त का वो दुनिया में जमा देते हैं इस तरह जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा देते हैं वो जिसे अपना समझते हैं मिटा देते हैं एक जुल रोज़ हमें आप नया देते हैं वादा-ए-वस्ल को बातों में उड़ा देते हैं ख़ुम-ओ-मीना-ओ-सुबू बज़्म में आते आते अपनी आँखों से कई जाम पिला देते हैं हुस्न का कोई जुदा तो नहीं होता अंदाज़ इश्क़ वाले उन्हें अंदाज़ सिखा देते हैं कोसने देते हैं जिस वक़्त बुतान-ए-तन्नाज़ हाथ उठाए हुए हम उन को दुआ देते हैं मेरे ख़्वाबों में भी आते हैं अदू के हमराह ये वफ़ाओं का मिरी आप सिला देते हैं हालत-ए-ग़ैर पे यूँँ ख़ैर से हँसने वाले इस तवज्जोह की भी हम तुम को दुआ देते हैं शहर में रोज़ उड़ा कर मिरे मरने की ख़बर जश्न वो रोज़ रक़ीबों का मना देते हैं दैर-ओ-का'बा हो कलीसा हो कि मय-ख़ाना हो सब हर इक दर पे तुझी को तो सदा देते हैं इश्वा-ओ-हुस्न-ओ-अदा पर तिरी मरने वाले कितने मासूम यूँँही उम्र गँवा देते हैं पए गुल-गश्त वो गुल-पोश जो आए 'गुलज़ार' ज़िंदगी सब्ज़े के मानिंद बिछा देते हैं — Gulzar Dehlvi
एक काफ़िर-अदा ने लूट लिया उन की शर्म-ओ-हया ने लूट लिया इक बुत-ए-बेवफ़ा ने लूट लिया मुझ को तेरे ख़ुदा ने लूट लिया आशनाई बुतों से कर बैठे आश्ना-ए-जफ़ा ने लूट लिया हम ये समझे कि मरहम-ए-ग़म है दर्द बन कर दवा ने लूट लिया उन के मस्त-ए-ख़िराम ने मारा उन की तर्ज़-ए-अदा ने लूट लिया हुस्न-ए-यकता की रहज़नी तौबा इक फ़रेब-ए-नवा ने लूट लिया होश-ओ-ईमान-ओ-दीन क्या कहिए शोख़ी-ए-नक़श-ए-पा ने लूट लिया रहबरी थी कि रहज़नी तौबा हम को फ़रमाँ-रवा ने लूट लिया एक शोला-नज़र ने क़त्ल किया एक रंगीं-क़बा ने लूट लिया हम को ये भी ख़बर नहीं 'गुलज़ार' कब बुत-ए-बेवफ़ा ने लूट लिया हाए वो ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू तौबा हम को बाद-ए-सबा ने लूट लिया उन को 'गुलज़ार' मैं ख़ुदा समझा मुझ को मेरे ख़ुदा ने लूट लिया — Gulzar Dehlvi
मक़्सद-ए-हुस्न है क्या चश्म-ए-बसीरत के सिवा वज्ह-ए-तख़्लीक़-ए-बशर क्या है मोहब्बत के सिवा ख़ून-ए-दिल थूकते फिरते हैं जहाँ में शाइ'र क्या मिला शहर-ए-सुख़न में उन्हें शोहरत के सिवा आज भी इ'ल्म-ओ-फ़न-ओ-शे'र-ओ-अदब हैं पामाल बा-कमालों को मिला कुछ न इहानत के सिवा हाथ में जिन के ख़ुशामद का है गदला कश्कोल उन को ए'ज़ाज़ भी मिल जाएँगे इज़्ज़त के सिवा रात दिन रंज है इस बात का सब को ख़ालिक़ अर्सा-ए-हश्र में क्या लाएँ नदामत के सिवा ये मशीनों की चका-चौंद ये दौर-ए-आलात इस में हर चीज़ मुक़द्दर है मुरव्वत के सिवा ग़ोता-ज़न हम रहे कसरत के समुंदर में फ़ुज़ूल कौन ये प्यास बुझाए तिरी वहदत के सिवा क्या ज़माने में दिया तू ने अक़ीदत का मआल हम को रंज-ओ-ग़म-ओ-अंदोह-ओ-मुसीबत के सिवा हम जो अपनाएँ ज़माने में तवक्कुल यारब बाब खुल जाएँगे हम पर तिरी रहमत के सिवा जब उतरती हों सर-ए-अर्श से आयात-ए-जुनूँ कौन हो ख़ालिक़-ए-अशआ'र मशिय्यत के सिवा कितने हातिम मिले 'गुलज़ार' ज़माने में हमें वो कि हर चीज़ के वासिफ़ थे सख़ावत के सिवा — Gulzar Dehlvi
उन की नज़र का लुत्फ़ नुमायाँ नहीं रहा हम पर वो इल्तिफ़ात-ए-निगाराँ नहीं रहा दिल-बस्तगी-ओ-ऐश का सामाँ नहीं रहा ख़ुश-बाशी-ए-हयात का सामाँ नहीं रहा ये भी नहीं कि गुल में लताफ़त नहीं रही पर जन्नत-निगाह गुलिस्ताँ नहीं रहा हर बे-हुनर से गर्म है बाज़ार‌‌‌‌-ए-सिफ़लगी अहल-ए-हुनर के वास्ते मैदाँ नहीं रहा अपनी ज़बान अपना तमद्दुन बदल गया लुत्फ़-ए-कलाम अब वो सुख़न-दाँ नहीं रहा क्यूँँ अब तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत से है गुरेज़ क्या वो जुनून-ए-कूचा-ए-जानाँ नहीं रहा सीखा है हादसात-ए-ज़माना से खेलना हम को हिरास-ए-मौजा-ए-तूफ़ाँ नहीं रहा हर बैत जिस के फ़ैज़ से बैत-उल-ग़ज़ल बने अब वो सुरूर-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँ नहीं रहा दीवानगी-ए-शौक़ के क़ुर्बान जाइए अब इमतियाज़-ए-जेब-ओ-गरेबाँ नहीं रहा पीर-ए-मुग़ाँ की बैअत-ए-कामिल के फ़ैज़ से अब शैख़ नाम का भी मुसलमाँ नहीं रहा उन की निगाह-ए-नाज़ का ये इल्तिफ़ात है चारागरों का ज़ीस्त पर एहसाँ नहीं रहा क्या हाल है तुम्हारा अज़ीज़ान-ए-लखनऊ तहज़ीब-ए-अहल-ए-दिल्ली का पुरसाँ नहीं रहा हर शय है इस जहान में लेकिन ख़ुदा-गवाह 'गुलज़ार' इस दयार में इंसाँ नहीं रहा — Gulzar Dehlvi
न सानी जब मज़ाक़‌‌‌‌-ए-हुस्न को अपना नज़र आया निगाह-ए-शौक़ तक ले कर पयाम-ए-फ़ित्ना-गर आया कहा ला-रैब बढ़ कर इल्म-ओ-दानिश ने अक़ीदत से जो बज़्म-ए-अहल-ए-फ़न में आज मुझ सा बे-हुनर आया सर-ए-महफ़िल चुराना मुझ से दामन इस का ज़ामिन है नहीं आया अगर मुझ तक ब-अंदाज़-ए-दिगर आया बहुत ऐ दिल तिरी रूदाद-ए-ग़म ने तूल खींचा है कभी वो बुत भी सुनने को ये क़िस्सा मुख़्तसर आया हमारी इक ख़ता ने ख़ुल्द से दुनिया में ला फेंका अगर दर-पेश दुनिया से भी फिर कोई सफ़र आया मैं ख़ुद ही बे-वफ़ा हूँ बे-अदब हूँ अपना क़ातिल हूँ हर इक इल्ज़ाम मेरे सर ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर आया मुकद्दर कुछ फ़ज़ा 'गुलज़ार' दिल्ली में सही लेकिन कहीं अहल-ए-ज़बाँ हम सा भी उर्दू में नज़र आया — Gulzar Dehlvi
दिल ही दिल में दर्द के ऐसे इशारे हो गए ग़म ज़माने के शरीक-ए-ग़म हमारे हो गए जो अभी महफ़ूज़ हैं तन्क़ीद है उन का शिआ'र हाल उन का पूछिए जो बे-सहारे हो गए बिन खिले मुरझा गईं कलियाँ चमन में किस क़दर ज़र्द-रू किस दर्जा हाए माह-पारे हो गए अम्न की ताक़त को कुचला सच को रुस्वा कर दिया दुश्मनों के चार-दिन में वारे-न्यारे हो गए ये ज़माना किस क़दर बार-ए-गराँ साबित हुआ अपने बेगाने हुए बेगाने प्यारे हो गए दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-सुकूँ एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे हो गए डूबने वालों से ज़ाइद खा रहा है उन का ग़म जिन को साहिल तेग़-ए-उर्यां के किनारे हो गए अश्क-ए-ग़म में नूर-ए-रहमत इस तरह शामिल रहा चाँद-तारों से सिवा ये चाँद-तारे हो गए हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में छा गई ग़म की घटा जो शगूफ़े थे चमन में वो शरारे हो गए — Gulzar Dehlvi
ऐ मसीहा-दम तिरे होते हुए क्या हो गया बैठे-बिठलाए मरीज़-ए-इश्क़ ठंडा हो गया यूँँ मिरा सोज़-ए-जिगर दुनिया में रुस्वा हो गया शेर-ओ-नग़्मा रंग-ओ-निकहत जाम-ओ-सहबा हो गया चारा-गर किस काम की बख़िया-गरी तेरी कि अब और भी चाक-ए-जिगर मेरा हुवैदा हो गया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ या मरी दीवानगी जो तमाशा करने आया ख़ुद तमाशा हो गया हाए ये ताज़ा हवा गुलशन में कैसी चल पड़ी बुलबुल-ए-बाग़-ओ-बहाराँ रू-ब-सहरा हो गया उम्र-भर की मुश्किलें पल भर में आसाँ हो गईं उन के आते हैं मरीज़-ए-इश्क़ अच्छा हो गया क्या मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर से खिल उठी है चाँदनी किन चराग़ों से ज़माने में उजाला हो गया हर तरह मायूस और महरूम हो कर प्यार से जिस के तुम प्यारे थे वो मौला को प्यारा हो गया हम गुनहगारों की लग़्ज़िश हश्र में काम आ गई चश्म-ए-नम का दामन-ए-तर को सहारा हो गया इक मिरी शाख़-ए-नशेमन फूँकने के वास्ते किस की कज-फ़हमी से घर-भर में उजाला हो गया अब शफ़क़ या अब्र का 'गुलज़ार' क्यूँँ हो इंतिज़ार उन की आँखों से जो पीने का इशारा हो गया — Gulzar Dehlvi
पहले तो दाम-ए-ज़ुल्फ़ में उलझा लिया मुझे भूले से फिर कभी न दिलासा दिया मुझे क्या दर्दनाक मंज़र-ए-कश्ती था रूद में मैं ना-ख़ुदा को देख रहा था ख़ुदा मुझे बैठा हुआ है रश्क-ए-मसीहा मिरे क़रीब कस बेबसी से देख रही है क़ज़ा मुझे उन का बयान मेरी ज़बाँ पर जो आ गया लहजे ने उन के कर दिया क्या ख़ुश-नवा मुझे जिन को रही सदा मिरे मरने की आरज़ू जीने की दे रहे हैं वही अब दुआ मुझे जाने का वक़्त आया तो आई सदा-ए-हक़ मुद्दत से आरज़ू थी मिले हम-नवा मुझे हर बाम-ओ-दर से एक इशारा है रोज़-ओ-शब ने मैं वफ़ा को छोड़ सका ने वफ़ा मुझे दुनिया ने कितने मुझ को दिखाए हैं सब्ज़ बाग़ उन से न कोई कर सका लेकिन जुदा मुझे ख़ुश्बू से किस की महक रहे हैं मशाम-ए-जाँ दामन से दे रहा है कोई तो हवा मुझे तस्वीर उस के हाथ में लब पर मिरी ग़ज़ल देखा न एक आँख न जिस ने सुना मुझे फ़र्द-ए-अमल में मेरी हों शामिल सब उन के जौर उन के किए की शौक़ से दीजे सज़ा मुझे मेरी वफ़ा का उन को मिले हश्र में सिला मिल जाएँ उन के नाम के जौर-ओ-जफ़ा मुझे हर रोज़ मुझ को अपना बदलना पड़ा जवाब रोज़ इक सबक़ पढ़ाता है क़ासिद नया मुझे देखा तुम्हारी शक्ल में हुस्न-ए-अज़ल की ज़ौ सज्दा तुम्हारे दर पे हुआ है रवा मुझे झोंका कोई नसीम का 'गुलज़ार'-ए-नाज़ में उन का पयाम काश सुनाए सबा मुझे — Gulzar Dehlvi
फ़लाह-ए-आदमियत में सऊबत सह के मर जाना यही है काम कर जाना यही है नाम कर जाना जहाँ इंसानियत वहशत के हाथों ज़ब्ह होती हो जहाँ तज़लील है जीना वहाँ बेहतर है मर जाना यूँँही दैर ओ हरम की ठोकरें खाते फिरे बरसों तिरी ठोकर से लिक्खा था मुक़द्दर का सँवर जाना सुकून-ए-रूह मिलता है ज़माने को तिरे दर से बहिश्त-ओ-ख़ुल्द के मानिंद हम ने तेरा दर जाना हमारी सादा-लौही थी ख़ुदा-बख़्शे कि ख़ुश-फ़हमी कि हर इंसान की सूरत को मा-फ़ौक़-उल-बशर जाना ये है रिंदों पे रहमत रोज़-ए-महशर ख़ुद मशिय्यत ने लिखा है आब-ए-कौसर से निखर जाना सँवर जाना चमन में इस क़दर सह में हुए हैं आशियाँ वाले कि जुगनू की चमक को साज़िश-ए-बर्क़-ओ-शरर जाना हमें ख़ार-ए-वतन 'गुलज़ार' प्यारे हैं गुल-ए-तर से कि हर ज़र्रे को ख़ाक-ए-हिंद के शम्स ओ क़मर जाना — Gulzar Dehlvi
बिठा के दिल में गिराया गया नज़र से मुझे दिखाया तुरफ़ा-तमाशा बला के घर से मुझे नज़र झुका के उठाई थी जैसे पहली बार फिर एक बार तो देखो उसी नज़र से मुझे हमेशा बच के चला हूँ मैं आम राहों से हटा सका न कोई मेरी रहगुज़र से मुझे हयात जिस की अमानत है सौंप दूँ उस को उतारना है ये क़र्ज़ा भी अपने सर से मुझे सुबू न जाम न मीना से मय पिला बे-शक पिलाए जा मिरे साक़ी यूँँही नज़र से मुझे जो बात होती है दिल में वो कह गुज़रता हूँ नहीं है कोई ग़रज़ अह्ले-ए-ख़ैर-ओ-शर से मुझे न दैर से न हरम से न मय-कदे से मिला सुकून-ए-रूह मिला है जो तेरे दर से मुझे किसी की राह-ए-मोहब्बत में बढ़ता जाता हूँ न राहज़न से ग़रज़ है न राहबर से मुझे ज़रा तो सोच हिक़ारत से देखने वाले ज़माना देख रहा है तिरी नज़र से मुझे ज़माना मेरी नज़र से तो गिर गया लेकिन गिरा सका न ज़माना तिरी नज़र से मुझे ये रंग-ओ-नूर का 'गुलज़ार' दहर-ए-फ़ानी है यही पयाम मिला उम्र-ए-मुख़्तसर से मुझे — Gulzar Dehlvi