दिल-बस्तगी-ओ-ऐश का सामाँ नहीं रहा
ख़ुश-बाशी-ए-हयात का सामाँ नहीं रहा
ये भी नहीं कि गुल में लताफ़त नहीं रही
पर जन्नत-निगाह गुलिस्ताँ नहीं रहा
हर बे-हुनर से गर्म है बाज़ार-ए-सिफ़लगी
अहल-ए-हुनर के वास्ते मैदाँ नहीं रहा
अपनी ज़बान अपना तमद्दुन बदल गया
लुत्फ़-ए-कलाम अब वो सुख़न-दाँ नहीं रहा
क्यूँ अब तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत से है गुरेज़
क्या वो जुनून-ए-कूचा-ए-जानाँ नहीं रहा
सीखा है हादसात-ए-ज़माना से खेलना
हम को हिरास-ए-मौजा-ए-तूफ़ाँ नहीं रहा
हर बैत जिस के फ़ैज़ से बैत-उल-ग़ज़ल बने
अब वो सुरूर-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँ नहीं रहा
दीवानगी-ए-शौक़ के क़ुर्बान जाइए
अब इमतियाज़-ए-जेब-ओ-गरेबाँ नहीं रहा
पीर-ए-मुग़ाँ की बैअत-ए-कामिल के फ़ैज़ से
अब शैख़ नाम का भी मुसलमाँ नहीं रहा
उन की निगाह-ए-नाज़ का ये इल्तिफ़ात है
चारागरों का ज़ीस्त पर एहसाँ नहीं रहा
क्या हाल है तुम्हारा अज़ीज़ान-ए-लखनऊ
तहज़ीब-ए-अहल-ए-दिल्ली का पुरसाँ नहीं रहा
हर शय है इस जहान में लेकिन ख़ुदा-गवाह
'गुलज़ार' इस दयार में इंसाँ नहीं रहा
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न सानी जब मज़ाक़-ए-हुस्न को अपना नज़र आया
निगाह-ए-शौक़ तक ले कर पयाम-ए-फ़ित्ना-गर आया
निगाह-ए-शौक़ तक ले कर पयाम-ए-फ़ित्ना-गर आया
कहा ला-रैब बढ़ कर इल्म-ओ-दानिश ने अक़ीदत से
जो बज़्म-ए-अहल-ए-फ़न में आज मुझ सा बे-हुनर आया
सर-ए-महफ़िल चुराना मुझ से दामन इस का ज़ामिन है
नहीं आया अगर मुझ तक ब-अंदाज़-ए-दिगर आया
बहुत ऐ दिल तिरी रूदाद-ए-ग़म ने तूल खींचा है
कभी वो बुत भी सुनने को ये क़िस्सा मुख़्तसर आया
हमारी इक ख़ता ने ख़ुल्द से दुनिया में ला फेंका
अगर दर-पेश दुनिया से भी फिर कोई सफ़र आया
मैं ख़ुद ही बे-वफ़ा हूँ बे-अदब हूँ अपना क़ातिल हूँ
हर इक इल्ज़ाम मेरे सर ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर आया
मुकद्दर कुछ फ़ज़ा 'गुलज़ार' दिल्ली में सही लेकिन
कहीं अहल-ए-ज़बाँ हम सा भी उर्दू में नज़र आया
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दिल ही दिल में दर्द के ऐसे इशारे हो गए
ग़म ज़माने के शरीक-ए-ग़म हमारे हो गए
ग़म ज़माने के शरीक-ए-ग़म हमारे हो गए
जो अभी महफ़ूज़ हैं तन्क़ीद है उन का शिआ'र
हाल उन का पूछिए जो बे-सहारे हो गए
बिन खिले मुरझा गईं कलियाँ चमन में किस क़दर
ज़र्द-रू किस दर्जा हाए माह-पारे हो गए
अम्न की ताक़त को कुचला सच को रुस्वा कर दिया
दुश्मनों के चार-दिन में वारे-न्यारे हो गए
ये ज़माना किस क़दर बार-ए-गराँ साबित हुआ
अपने बेगाने हुए बेगाने प्यारे हो गए
दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-सुकूँ
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे हो गए
डूबने वालों से ज़ाइद खा रहा है उन का ग़म
जिन को साहिल तेग़-ए-उर्यां के किनारे हो गए
अश्क-ए-ग़म में नूर-ए-रहमत इस तरह शामिल रहा
चाँद-तारों से सिवा ये चाँद-तारे हो गए
हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में छा गई ग़म की घटा
जो शगूफ़े थे चमन में वो शरारे हो गए
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अब तो सहरा में रहेंगे चल के दीवानों के साथ
दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ
दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ
ख़त्म हो जाएँगे क़िस्से कल ये दीवानों के साथ
फिर इन्हें दोहराओगे तुम कितने उनवानों के साथ
बज़्म में हम को बुला कर आप उठ कर चल दिए
क्या सुलूक-ए-नारवा जाएज़ है मेहमानों के साथ
नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन
क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ
उन की आँखों की गुलाबी से जो हम मख़मूर हैं
इक तअ'ल्लुक़ है क़दीमी हम को पैमानों के साथ
हर तरफ़ कू-ए-बुताँ में हसरतों का है हुजूम
एक दिल लाए थे हम तो अपना अरमानों के साथ
कल तलक दानाओं की सोहबत में थे सब के इमाम
आज कैसे सुस्त हैं यूँ शैख़ नादानों के साथ
उन की आँखें इक तरफ़ ये जाम-ओ-मीना इक तरफ़
किस तरह गर्दिश में हैं पैमाने पैमानों के साथ
आशिक़ों के दिल में शब फ़ानूस रौशन हो गए
शम्अ''' का जीना है लाज़िम अपने परवानों के साथ
हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल यगाने हो गए
लहलहा कर अब रहेगा सब्ज़ा बेगानों के साथ
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सब के सब बैठे थे क़ातिल के क़रीब
बे-कसी थी सिर्फ़ बिस्मिल के क़रीब
ज़िंदगी क्या थी अजब तूफ़ान थी
अब कहीं पहुँचे हैं मंज़िल के क़रीब
इस क़दर ख़ुद-रफ़्ता-ए-सहरा हुए
भूल कर देखा न महमिल के क़रीब
हाए उस मुख़्तार की मजबूरियाँ
जिस ने दम तोड़ा हो मंज़िल के क़रीब
ज़िंदगी-ओ-मौत वाहिद आइना
आदमी है हद्द-ए-फ़ासिल के क़रीब
ये तजाहुल आरिफ़ाना है जनाब
भूल कर जाना न ग़ाफ़िल के क़रीब
तर्बियत को हुस्न-ए-सोहबत चाहिए
बैठिए उस्ताद-ए-कामिल के क़रीब
होश की कहता है दीवाना सदा
और मायूसी है आक़िल के क़रीब
देखिए उन बद-नसीबों का मआल
वो जो डूबे आ के साहिल के क़रीब
छाई है 'गुलज़ार' में फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
फूल हैं सब गुल शमाइल के क़रीब
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पहले तो दाम-ए-ज़ुल्फ़ में उलझा लिया मुझे
भूले से फिर कभी न दिलासा दिया मुझे
भूले से फिर कभी न दिलासा दिया मुझे
क्या दर्दनाक मंज़र-ए-कश्ती था रूद में
मैं ना-ख़ुदा को देख रहा था ख़ुदा मुझे
बैठा हुआ है रश्क-ए-मसीहा मिरे क़रीब
कस बेबसी से देख रही है क़ज़ा मुझे
उन का बयान मेरी ज़बाँ पर जो आ गया
लहजे ने उन के कर दिया क्या ख़ुश-नवा मुझे
जिन को रही सदा मिरे मरने की आरज़ू
जीने की दे रहे हैं वही अब दुआ मुझे
जाने का वक़्त आया तो आई सदा-ए-हक़
मुद्दत से आरज़ू थी मिले हम-नवा मुझे
हर बाम-ओ-दर से एक इशारा है रोज़-ओ-शब
ने मैं वफ़ा को छोड़ सका ने वफ़ा मुझे
दुनिया ने कितने मुझ को दिखाए हैं सब्ज़ बाग़
उन से न कोई कर सका लेकिन जुदा मुझे
ख़ुश्बू से किस की महक रहे हैं मशाम-ए-जाँ
दामन से दे रहा है कोई तो हवा मुझे
तस्वीर उस के हाथ में लब पर मिरी ग़ज़ल
देखा न एक आँख न जिस ने सुना मुझे
फ़र्द-ए-अमल में मेरी हों शामिल सब उन के जौर
उन के किए की शौक़ से दीजे सज़ा मुझे
मेरी वफ़ा का उन को मिले हश्र में सिला
मिल जाएँ उन के नाम के जौर-ओ-जफ़ा मुझे
हर रोज़ मुझ को अपना बदलना पड़ा जवाब
रोज़ इक सबक़ पढ़ाता है क़ासिद नया मुझे
देखा तुम्हारी शक्ल में हुस्न-ए-अज़ल की ज़ौ
सज्दा तुम्हारे दर पे हुआ है रवा मुझे
झोंका कोई नसीम का 'गुलज़ार'-ए-नाज़ में
उन का पयाम काश सुनाए सबा मुझे
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हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा
वाक़िए हो गए कहानी से
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उस सितमगर की मेहरबानी से
दिल उलझता है ज़िंदगानी से
दिल उलझता है ज़िंदगानी से
ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं
धुल गए नक़्श कितने पानी से
हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है
इन हसीनों की मेहरबानी से
और भी क्या क़यामत आएगी
पूछना है तिरी जवानी से
दिल सुलगता है अश्क बहते हैं
आग बुझती नहीं है पानी से
हसरत-ए-उम्र-ए-जावेदाँ ले कर
जा रहे हैं सरा-ए-फ़ानी से
हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा
वाक़िए हो गए कहानी से
कितनी ख़ुश-फ़हमियों के बुत तोड़े
तू ने गुलज़ार ख़ुश-बयानी से
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