तेरी गली को छोड़ के पागल नहीं गया
रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया
रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया
मजनूँ की तरह छोड़ा नहीं मैं ने शहर को
या'नी मैं हिज्र काटने जंगल नहीं गया
उस को नज़र उठा के ज़रा देखने तो दे
फिर कहना मेरा जादू अगर चल नहीं गया
हाए वो आँखें टाट को तकते ही बुझ गईं
हाए वो दिल कि जानिब-ए-मख़मल नहीं गया
तेरे मकाँ के बा'द क़दम ही नहीं उठे
तेरे मकाँ से आगे मैं पैदल नहीं गया
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बात ऐसी भी भला आप में क्या रक्खी है
इक दिवाने ने ज़मीं सर पे उठा रक्खी है
Read Fullइक दिवाने ने ज़मीं सर पे उठा रक्खी है
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अब इस भ्रम में हर एक रात काटनी है मुझे
के आने वाली तेरे साथ काटनी हैं मुझे
के आने वाली तेरे साथ काटनी हैं मुझे
तुझे दिलाना है एहसास अपने इस दुख का
तू कुछ तो बोल तेरी बात काटनी है मुझे
मुझे तुलू-ए-सहर की तसल्लीया मत दे
अभी तो ये शब-ए-जुलमात काटनी हैं मुझे
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