तेरी गली को छोड़ के पागल नहीं गया
रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया
मजनूँ की तरह छोड़ा नहीं मैं ने शहर को
या'नी मैं हिज्र काटने जंगल नहीं गया
उस को नज़र उठा के ज़रा देखने तो दे
फिर कहना मेरा जादू अगर चल नहीं गया
हाए वो आँखें टाट को तकते ही बुझ गईं
हाए वो दिल कि जानिब-ए-मख़मल नहीं गया
तेरे मकाँ के बाद क़दम ही नहीं उठे
तेरे मकाँ से आगे मैं पैदल नहीं गया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Ismail Raaz
our suggestion based on Ismail Raaz
As you were reading One sided love Shayari Shayari