Akbar Allahabadi

Akbar Allahabadi

@akbar-allahabadi

📍 Allahabad· India

Akbar Allahabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akbar Allahabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ — Akbar Allahabadi
दावा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए — Akbar Allahabadi
इश्क़ के इज़हार में हर-चंद रुस्वाई तो है पर करूँँ क्या अब तबीअत आप पर आई तो है — Akbar Allahabadi
लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं — Akbar Allahabadi
मोहब्बत का तुम से असर क्या कहूँ नज़र मिल गई दिल धड़कने लगा — Akbar Allahabadi
कोट और पतलून जब पहना तो मिस्टर बन गया जब कोई तक़रीर की जलसे में लीडर बन गया — Akbar Allahabadi
जो वक़्त-ए-ख़त्ना मैं चीख़ा तो नाई ने कहा हँस कर मुसलमानी में ताक़त ख़ून ही बहने से आती है — Akbar Allahabadi
इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम वस्ल का दिल से मिरे अरमान रुख़्सत हो गया — Akbar Allahabadi
ग़ज़ब है वो ज़िद्दी बड़े हो गए मैं लेटा तो उठ के खड़े हो गए — Akbar Allahabadi
बी.ए भी पास हों मिले बी-बी भी दिल-पसंद मेहनत की है वो बात ये क़िस्मत की बात है — Akbar Allahabadi
दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते — Akbar Allahabadi
जो है ज़बाँ पे दिल को नहीं उस सेे फ़ाएदा जो दिल में है वो ला नहीं सकते ज़बान पर — Akbar Allahabadi
जो कहा मैं ने कि प्यार आता है मुझ को तुम पर हँस के कहने लगा और आप को आता क्या है — Akbar Allahabadi
नाज़ क्या इस पे जो बदला है ज़माने ने तुम्हें मर्द हैं वो जो ज़माने को बदल देते हैं — Akbar Allahabadi
निगाह-ए-गर्म क्रिसमस में भी रही हम पर हमारे हक़ में दिसम्बर भी माह-ए-जून हुआ — Akbar Allahabadi
धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का चंदा वसूल होता है साहब दबाव से — Akbar Allahabadi
हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिल-ए-ज़ब्ती समझते हैं कि जिन को पढ़ के लड़के बाप को ख़ब्ती समझते हैं — Akbar Allahabadi
लिपट भी जा न रुक 'अकबर' ग़ज़ब की ब्यूटी है नहीं नहीं पे न जा ये हया की ड्यूटी है — Akbar Allahabadi
हंगामा है क्यूँँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है — Akbar Allahabadi

Ghazal

ये सुस्त है तो फिर क्या वो तेज़ है तो फिर क्या नेटिव जो है तो फिर क्या अंग्रेज़ है तो फिर क्या रहना किसी से दब कर है अम्न को ज़रूरी फिर कोई फ़िरक़ा हैबत-अंगेज़ है तो फिर क्या रंज ओ ख़ुशी की सब में तक़्सीम है मुनासिब बाबू जो है तो फिर क्या चंगेज़ है तो फिर क्या हर रंग में हैं पाते बंदे ख़ुदा के रोज़ी है पेंटर तो फिर क्या रंगरेज़ है तो फिर क्या जैसी जिसे ज़रूरत वैसी ही उस की चीज़ें याँ तख़्त है तो फिर क्या वाँ मेज़ है तो फिर क्या मफ़क़ूद हैं अब इस के सुनने समझने वाले मेरा सुख़न नसीहत-आमेज़ है तो फिर क्या — Akbar Allahabadi
हवा-ए-शब भी है अम्बर-अफ़्शाँ उरूज भी है मह-ए-मुबीं का निसार होने की दो इजाज़त महल नहीं है नहीं नहीं का अगर हो ज़ौक़-ए-सुजूद पैदा सितारा हो औज पर जबीं का निशान-ए-सज्दा ज़मीन पर हो तो फ़ख़्र है वो रुख़-ए-ज़मीं का सबा भी उस गुल के पास आई तो मेरे दिल को हुआ ये खटका कोई शगूफ़ा न ये खिलाए पयाम लाई न हो कहीं का न मेहर ओ मह पर मिरी नज़र है न लाला-ओ-गुल की कुछ ख़बर है फ़रोग़-ए-दिल के लिए है काफ़ी तसव्वुर उस रू-ए-आतिशीं का न इल्म-ए-फ़ितरत में तुम हो माहिर न ज़ौक़-ए-ताअत है तुम से ज़ाहिर ये बे-उसूली बहुत बुरी है तुम्हें न रक्खेगी ये कहीं का — Akbar Allahabadi
जब यास हुई तो आहों ने सीने से निकलना छोड़ दिया अब ख़ुश्क-मिज़ाज आँखें भी हुईं दिल ने भी मचलना छोड़ दिया नावक-फ़गनी से ज़ालिम की जंगल में है इक सन्नाटा सा मुर्ग़ान-ए-ख़ुश-अलहाँ हो गए चुप आहू ने उछलना छोड़ दिया क्यूँँ किब्र-ओ-ग़ुरूर इस दौर पे है क्यूँँ दोस्त फ़लक को समझा है गर्दिश से ये अपनी बाज़ आया या रंग बदलना छोड़ दिया बदली वो हवा गुज़रा वो समाँ वो राह नहीं वो लोग नहीं तफ़रीह कहाँ और सैर कुजा घर से भी निकलना छोड़ दिया वो सोज़-ओ-गुदाज़ उस महफ़िल में बाक़ी न रहा अंधेर हुआ परवानों ने जलना छोड़ दिया शम्ओं ने पिघलना छोड़ दिया हर गाम पे चंद आँखें निगराँ हर मोड़ पे इक लेसंस-तलब उस पार्क में आख़िर ऐ 'अकबर' मैं ने तो टहलना छोड़ दिया क्या दीन को क़ुव्वत दें ये जवाँ जब हौसला-अफ़्ज़ा कोई नहीं क्या होश सँभालें ये लड़के ख़ुद उस ने सँभलना छोड़ दिया इक़बाल मुसाइद जब न रहा रक्खे ये क़दम जिस मंज़िल में अश्जार से साया दूर हुआ चश्मों ने उबलना छोड़ दिया अल्लाह की राह अब तक है खुली आसार-ओ-निशाँ सब क़ाएम हैं अल्लाह के बंदों ने लेकिन उस राह में चलना छोड़ दिया जब सर में हवा-ए-ताअत थी सरसब्ज़ शजर उम्मीद का था जब सर-सर-ए-इस्याँ चलने लगी इस पेड़ ने फलना छोड़ दिया उस हूर-लक़ा को घर लाए हो तुम को मुबारक ऐ 'अकबर' लेकिन ये क़यामत की तुम ने घर से जो निकलना छोड़ दिया — Akbar Allahabadi
तरीक़-ए-इश्क़ में मुझ को कोई कामिल नहीं मिलता गए फ़रहाद ओ मजनूँ अब किसी से दिल नहीं मिलता भरी है अंजुमन लेकिन किसी से दिल नहीं मिलता हमीं में आ गया कुछ नक़्स या कामिल नहीं मिलता पुरानी रौशनी में और नई में फ़र्क़ इतना है उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता पहुँचना दाद को मज़लूम का मुश्किल ही होता है कभी क़ाज़ी नहीं मिलते कभी क़ातिल नहीं मिलता हरीफ़ों पर ख़ज़ाने हैं खुले याँ हिज्र-ए-गेसू है वहाँ पे बिल है और याँ साँप का भी बिल नहीं मिलता ये हुस्न ओ इश्क़ ही का काम है शुबह करें किस पर मिज़ाज उन का नहीं मिलता हमारा दिल नहीं मिलता छुपा है सीना ओ रुख़ दिल-सिताँ हाथों से करवट में मुझे सोते में भी वो हुस्न से ग़ाफ़िल नहीं मिलता हवा से-ओ-होश गुम हैं बहर-ए-इरफ़ान-ए-इलाही में यही दरिया है जिस में मौज को साहिल नहीं मिलता किताब-ए-दिल मुझे काफ़ी है 'अकबर' दर्स-ए-हिकमत को मैं स्पेन्सर से मुस्तग़नी हूँ मुझ से मिल नहीं मिलता — Akbar Allahabadi
हूँ मैं परवाना मगर शम्अ' तो हो रात तो हो जान देने को हूँ मौजूद कोई बात तो हो दिल भी हाज़िर सर-ए-तस्लीम भी ख़म को मौजूद कोई मरकज़ हो कोई क़िबला-ए-हाजात तो हो दिल तो बेचैन है इज़हार-ए-इरादत के लिए किसी जानिब से कुछ इज़हार-ए-करामात तो हो दिल-कुशा बादा-ए-साफ़ी का किसे ज़ौक़ नहीं बातिन-अफ़रोज़ कोई पीर-ए-ख़राबात तो हो गुफ़्तनी है दिल-ए-पुर-दर्द का क़िस्सा लेकिन किस से कहिए कोई मुस्तफ़्सिर-ए-हालात तो हो दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल कौन कहे कौन सुने बज़्म में मौक़ा-ए-इज़हार-ए-ख़यालात तो हो वादे भी याद दिलाते हैं गिले भी हैं बहुत वो दिखाई भी तो दें उन से मुलाक़ात तो हो कोई वाइ'ज़ नहीं फ़ितरत से बलाग़त में सिवा मगर इंसान में कुछ फ़हम-ए-इशारात तो हो — Akbar Allahabadi
ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे मुँह से जो नहीं निकली है अब हाँ न करेंगे क्यूँँ ज़ुल्फ़ का बोसा मुझे लेने नहीं देते कहते हैं कि वल्लाह परेशाँ न करेंगे है ज़ेहन में इक बात तुम्हारे मुतअल्लिक़ ख़ल्वत में जो पूछोगे तो पिन्हाँ न करेंगे वाइज़ तो बनाते हैं मुसलमान को काफ़िर अफ़्सोस ये काफ़िर को मुसलमाँ न करेंगे क्यूँँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना सुनता हूँ वो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे दीवाना न समझे हमें वो समझे शराबी अब चाक कभी जेब ओ गरेबाँ न करेंगे वो जानते हैं ग़ैर मिरे घर में है मेहमाँ आएँगे तो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे — Akbar Allahabadi
दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो बंदगी हालत से ज़ाहिर है ख़ुदा हो या न हो झूमती है शाख़-ए-गुल खिलते हैं ग़ुंचे दम-ब-दम बा-असर गुलशन में तहरीक-ए-सबा हो या न हो वज्द में लाते हैं मुझ को बुलबुलों के ज़मज़मे आप के नज़दीक बा-मअ'नी सदा हो या न हो कर दिया है ज़िंदगी ने बज़्म-ए-हस्ती में शरीक उस का कुछ मक़्सूद कोई मुद्दआ' हो या न हो क्यूँँ सिवल-सर्जन का आना रोकता है हम-नशीं इस में है इक बात ऑनर की शिफ़ा हो या न हो मौलवी साहिब न छोड़ेंगे ख़ुदा गो बख़्श दे घेर ही लेंगे पुलिस वाले सज़ा हो या न हो मिमबरी से आप पर तो वार्निश हो जाएगी क़ौम की हालत में कुछ इस से जिला हो या न हो मो'तरिज़ क्यूँँ हो अगर समझे तुम्हें सय्याद दिल ऐसे गेसू हूँ तो शुबह दाम का हो या न हो — Akbar Allahabadi
हंगामा है क्या बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है वाँ दिल में कि सद में दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्में हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है — Akbar Allahabadi
दिल हो ख़राब दीन पे जो कुछ असर पड़े अब कार-ए-आशिक़ी तो बहर-कैफ़ कर पड़े इश्क़-ए-बुताँ का दीन पे जो कुछ असर पड़े अब तो निबाहना है जब इक काम कर पड़े मज़हब छुड़ाया इश्वा-ए-दुनिया ने शैख़ से देखी जो रेल ऊँट से आख़िर उतर पड़े बेताबियाँ नसीब न थीं वर्ना हम-नशीं ये क्या ज़रूर था कि उन्हीं पर नज़र पड़े बेहतर यही है क़स्द उधर का करें न वो ऐसा न हो कि राह में दुश्मन का घर पड़े हम चाहते हैं मेल वजूद-ओ-अदम में हो मुमकिन तो है जो बीच में उन की कमर पड़े दाना वही है दिल जो करे आप का ख़याल बीना वही नज़र है कि जो आप पर पड़े होनी न चाहिए थी मोहब्बत मगर हुई पड़ना न चाहिए था ग़ज़ब में मगर पड़े शैतान की न मान जो राहत-नसीब हो अल्लाह को पुकार मुसीबत अगर पड़े ऐ शैख़ उन बुतों की ये चालाकियाँ तो देख निकले अगर हरम से तो 'अकबर' के घर पड़े — Akbar Allahabadi
अगर दिल वाक़िफ़-ए-नैरंगी-ए-तब-ए-सनम होता ज़माने की दो-रंगी का उसे हरगिज़ न ग़म होता ये पाबंद-ए-मुसीबत दिल के हाथों हम तो रहते हैं नहीं तो चैन से कटती न दिल होता न ग़म होता उन्हीं की बे-वफ़ाई का ये है आठों-पहर सदमा वही होते जो क़ाबू में तो फिर काहे को ग़म होता लब-ओ-चश्म-ए-सनम गर देखने पाते कहीं शाइ'र कोई शीरीं-सुख़न होता कोई जादू-रक़म होता बहुत अच्छा हुआ आए न वो मेरी अयादत को जो वो आते तो ग़ैर आते जो ग़ैर आते तो ग़म होता अगर क़ब्रें नज़र आतीं न दारा-ओ-सिकन्दर की मुझे भी इश्तियाक़-ए-दौलत-ओ-जाह-ओ-हशम होता लिए जाता है जोश-ए-शौक़ हम को राह-ए-उल्फ़त में नहीं तो ज़ोफ़ से दुश्वार चलना दो-क़दम होता न रहने पाए दीवारों में रौज़न शुक्र है वर्ना तुम्हें तो दिल-लगी होती ग़रीबों पर सितम होता — Akbar Allahabadi
अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके उन को हम क़िस्सा-ए-ग़म अपना सुना ही न सके ज़ेहन मेरा वो क़यामत कि दो-आलम पे मुहीत आप ऐसे कि मिरे ज़ेहन में आ ही न सके देख लेते जो उन्हें तो मुझे रखते म'अज़ूर शैख़-साहिब मगर उस बज़्म में जा ही न सके अक़्ल महँगी है बहुत इश्क़ ख़िलाफ़-ए-तहज़ीब दिल को इस अहद में हम काम में ला ही न सके हम तो ख़ुद चाहते थे चैन से बैठें कोई दम आप की याद मगर दिल से भुला ही न सके इश्क़ कामिल है उसी का कि पतंगों की तरह ताब नज़्ज़ारा-ए-माशूक़ की ला ही न सके दाम-ए-हस्ती की भी तरकीब अजब रक्खी है जो फँसे उस में वो फिर जान बचा ही न सके मज़हर-ए-जल्वा-ए-जानाँ है हर इक शय 'अकबर' बे-अदब आँख किसी सम्त उठा ही न सके ऐसी मंतिक़ से तो दीवानगी बेहतर 'अकबर' कि जो ख़ालिक़ की तरफ़ दिल को झुका ही न सके — Akbar Allahabadi
बिठाई जाएँगी पर्दे में बीबियाँ कब तक बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियाँ कब तक हरम-सरा की हिफ़ाज़त को तेग़ ही न रही तो काम देंगी ये चिलमन की तीलियाँ कब तक मियाँ से बीबी हैं पर्दा है उन को फ़र्ज़ मगर मियाँ का इल्म ही उट्ठा तो फिर मियाँ कब तक तबीअतों का नुमू है हवा-ए-मग़रिब में ये ग़ैरतें ये हरारत ये गर्मियाँ कब तक अवाम बाँध लें दोहर तो थर्ड वानटर में सकंड-फ़र्स्ट की हों बंद खिड़कियाँ कब तक जो मुँह दिखाई की रस्मों पे है मुसिर इबलीस छुपेंगी हज़रत-ए-हवा की बेटियाँ कब तक जनाब हज़रत-ए-'अकबर' हैं हामी-ए-पर्दा मगर वो कब तक और उन की रुबाइयाँ कब तक — Akbar Allahabadi
हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए मंज़िल-ए-हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत-सरा-ए-बे-सबात होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए दिल ने देखा है बिसात-ए-क़ुव्वत-ए-इदराक को क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस कर कहा याद फिर मुझ को दिलाना भूल जाने के लिए दीदा-बाज़ी वो कहाँ आँखें रहा करती हैं बंद जान ही बाक़ी नहीं अब दिल लगाने के लिए मुझ को ख़ुश आई है मस्ती शैख़ जी को फ़रबही मैं हूँ पीने के लिए और वो हैं खाने के लिए अल्लाह अल्लाह के सिवा आख़िर रहा कुछ भी न याद जो किया था याद सब था भूल जाने के लिए सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन जोश-ए-दिल काफ़ी है 'अकबर' तान उड़ाने के लिए — Akbar Allahabadi
उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है जो ज़िंदगानी को तल्ख़ कर दे वो वक़्त मुझ पर गुज़र चुका है अगरचे सीने में साँस भी है नहीं तबीअत में जान बाक़ी अजल को है देर इक नज़र की फ़लक तो काम अपना कर चुका है ग़रीब-ख़ाने की ये उदासी ये ना-दुरुस्ती नहीं क़दीमी चहल पहल भी कभी यहाँ थी कभी ये घर भी सँवर चुका है ये सीना जिस में ये दाग़ में अब मसर्रतों का कभी था मख़्ज़न वो दिल जो अरमान से भरा था ख़ुशी से उस में ठहर चुका है ग़रीब अकबर के गर्द क्यूँँ में ख़याल वाइ'ज़ से कोई कह दे उसे डराते हो मौत से क्या वो ज़िंदगी ही से डर चुका है — Akbar Allahabadi