haqeeqi aur majaazi shayari mein farq ye paaya | हक़ीक़ी और मजाज़ी शायरी में फ़र्क़ ये पाया

  - Akbar Allahabadi

हक़ीक़ी और मजाज़ी शायरी में फ़र्क़ ये पाया
कि वो जामे से बाहर है ये पाजामे से बाहर है

  - Akbar Allahabadi

Partition Shayari

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    इस क़दर हम ख़ुश रखेंगे आपको ससुराल में
    आपको महसूस होगा जी रहे ननिहाल में

    दो गुलाबों की तरह है दो चमेली की तरह
    फ़र्क़ बस इतना तुम्हारे होंठ में और गाल में
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    Tanoj Dadhich
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    तुम मिलो अब, या उम्र भर न मिलो
    फ़र्क़ पड़ता था,अब नहीं पड़ता
    A R Sahil "Aleeg"
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    मैं जब मर जाऊँ तो मेरी अलग पहचान लिख देना
    लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना
    Rahat Indori
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    कुल जोड़ घटाकर जो ये संसार का दुख है
    उतना तो मिरे इक दिल-ए-बेज़ार का दुख है

    शाइर हैं तो दुनिया से अलग थोड़ी हैं लोगों
    सबकी ही तरह हमपे भी घर बार का दुख है
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    Ashutosh Vdyarthi
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    नताएज जब सर-ए-महशर मिलेंगे
    मोहब्बत के अलग नंबर मिलेंगे

    तुम्हारी मेज़बानी के बहाने
    कोई दिन हम भी अपने घर मिलेंगे
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    Khurram Afaq
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    आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहब
    वो अलग बाँध के रक्खा है जो माल अच्छा है
    Ameer Minai
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    मेरी शोहरत के तक़ाज़े ही अलग थे ताबिश
    गुमशुदा रहते हुए नाम कमाना था मुझे
    Tousief Tabish
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    जो तुम्हें मंज़िल पे ले जाएँगी वो राहें अलग हैं
    मैं वो रस्ता हूँ कि जिस पर तुम भटक कर आ गई हो
    Harman Dinesh
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    इश्क़ को छोड़ सब चुन लिया उसने फिर
    रख दिया फल को फिर टोकरी से अलग
    Neeraj Neer
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    जानती हो कि क्या हुआ है तुम्हें
    इश्क़ का रोग लग गया है तुम्हें

    तुमको देखें तो देखते जाएँ
    देखने का अलग मज़ा है तुम्हें
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    Pravin Rai
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As you were reading Shayari by Akbar Allahabadi

    ख़ुशी है सब को कि ऑपरेशन में ख़ूब निश्तर ये चल रहा है
    किसी को इस की ख़बर नहीं है मरीज़ का दम निकल रहा है

    फ़ना इसी रंग पर है क़ाइम फ़लक वही चाल चल रहा है
    शिकस्ता ओ मुंतशिर है वो कल जो आज साँचे में ढल रहा है

    ये देखते हो जो कासा-ए-सर ग़ुरूर-ए-ग़फ़लत से कल था ममलू
    यही बदन नाज़ से पला था जो आज मिट्टी में गल रहा है

    समझ हो जिस की बलीग़ समझे नज़र हो जिस की वसीअ' देखे
    अभी यहाँ ख़ाक भी उड़ेगी जहाँ ये क़ुल्ज़ुम उबल रहा है

    कहाँ का शर्क़ी कहाँ का ग़र्बी तमाम दुख सुख है ये मसावी
    यहाँ भी इक बा-मुराद ख़ुश है वहाँ भी इक ग़म से जल रहा है

    उरूज-ए-क़ौमी ज़वाल-ए-क़ौमी ख़ुदा की क़ुदरत के हैं करिश्मे
    हमेशा रद्द-ओ-बदल के अंदर ये अम्र पोलिटिकल रहा है

    मज़ा है स्पीच का डिनर में ख़बर ये छपती है पाइनियर में
    फ़लक की गर्दिश के साथ ही साथ काम यारों का चल रहा है
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    Akbar Allahabadi
    गले लगाएँ करें प्यार तुम को ईद के दिन
    इधर तो आओ मिरे गुल-एज़ार ईद के दिन

    ग़ज़ब का हुस्न है आराइशें क़यामत की
    अयाँ है क़ुदरत-ए-परवरदिगार ईद के दिन

    सँभल सकी न तबीअत किसी तरह मेरी
    रहा न दिल पे मुझे इख़्तियार ईद के दिन

    वो साल भर से कुदूरत भरी जो थी दिल में
    वो दूर हो गई बस एक बार ईद के दिन

    लगा लिया उन्हें सीने से जोश-ए-उल्फ़त में
    ग़रज़ कि आ ही गया मुझ को प्यार ईद के दिन

    कहीं है नग़्मा-ए-बुलबुल कहीं है ख़ंदा-ए-गुल
    अयाँ है जोश-ए-शबाब-ए-बहार ईद के दिन

    सिवय्याँ दूध शकर मेवा सब मुहय्या है
    मगर ये सब है मुझे नागवार ईद के दिन

    मिले अगर लब-ए-शीरीं का तेरे इक बोसा
    तो लुत्फ़ हो मुझे अलबत्ता यार ईद के दिन
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    Akbar Allahabadi
    कहाँ वो अब लुत्फ़-ए-बाहमी है मोहब्बतों में बहुत कमी है
    चली है कैसी हवा इलाही कि हर तबीअत में बरहमी है

    मिरी वफ़ा में है क्या तज़लज़ुल मिरी इताअ'त में क्या कमी है
    ये क्यूँ निगाहें फिरी हैं मुझ से मिज़ाज में क्यूँ ये बरहमी है

    वही है फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से अब तक तरक़्की-ए-कार-ए-हुस्न ओ उल्फ़त
    न वो हैं मश्क़-ए-सितम में क़ासिर न ख़ून-ए-दिल की यहाँ कमी है

    अजीब जल्वे हैं होश दुश्मन कि वहम के भी क़दम रुके हैं
    अजीब मंज़र हैं हैरत-अफ़्ज़ा नज़र जहाँ थी वहीं थमी है

    न कोई तकरीम-ए-बाहमी है न प्यार बाक़ी है अब दिलों में
    ये सिर्फ़ तहरीर में डियर सर है या जनाब-ए-मुकर्रमी है

    कहाँ के मुस्लिम कहाँ के हिन्दू भुलाई हैं सब ने अगली रस्में
    अक़ीदे सब के हैं तीन-तेरह न ग्यारहवीं है न अष्टमी है

    नज़र मिरी और ही तरफ़ है हज़ार रंग-ए-ज़माना बदले
    हज़ार बातें बनाए नासेह जमी है दिल में जो कुछ जमी है

    अगरचे मैं रिंद-ए-मोहतरम हूँ मगर इसे शैख़ से न पूछो
    कि उन के आगे तो इस ज़माने में सारी दुनिया जहन्नमी है
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    Akbar Allahabadi
    हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
    हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

    ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है
    मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना

    बलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं
    ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना

    ख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है
    मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना
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    Akbar Allahabadi
    न बहते अश्क तो तासीर में सिवा होते
    सदफ़ में रहते ये मोती तो बे-बहा होते

    मुझ ऐसे रिंद से रखते ज़रूर ही उल्फ़त
    जनाब-ए-शैख़ अगर आशिक़-ए-ख़ुदा होते

    गुनाहगारों ने देखा जमाल-ए-रहमत को
    कहाँ नसीब ये होता जो बे-ख़ता होते

    जनाब-ए-हज़रत-ए-नासेह का वाह क्या कहना
    जो एक बात न होती तो औलिया होते

    मज़ाक़-ए-इश्क़ नहीं शेख़ में ये है अफ़्सोस
    ये चाशनी भी जो होती तो क्या से क्या होते

    महल्ल-ए-शुक्र हैं 'अकबर' ये दरफ़शाँ नज़्में
    हर इक ज़बाँ को ये मोती नहीं अता होते
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    Akbar Allahabadi

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